ब्रिटिश सेना में सिख रेजिमेंट बनाने की प्लानिंग, गोरखा ब्रिगेड की तर्ज पर होगी स्थापना, जानें डिटेल

ब्रिटेन की संसद में एक पुराना सवाल फिर से नए तेवर के साथ गूंजा: क्या ब्रिटिश सेना को एक बार फिर ‘सिख रेजिमेंट’ की स्थापना करनी चाहिए? सदी पुरानी बहस, जो अब तक आधिकारिक फाइलों में दबी रही, अब सामने आती दिख रही है.

Planning to form a Sikh regiment in the British Army
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

लंदन: ब्रिटेन की संसद में एक पुराना सवाल फिर से नए तेवर के साथ गूंजा: क्या ब्रिटिश सेना को एक बार फिर ‘सिख रेजिमेंट’ की स्थापना करनी चाहिए? सदी पुरानी बहस, जो अब तक आधिकारिक फाइलों में दबी रही, अब सामने आती दिख रही है. देश के रक्षा मंत्री वर्नोन रॉडनी कोकर ने संकेत दिया है कि यह विचार अब केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकार इस पर संजीदगी से विचार कर रही है.

यह बयान तब आया जब लेबर पार्टी के सिख सांसद लॉर्ड कुलदीप सिंह सहोता ने संसद में औपचारिक रूप से इस विषय को उठाया. उन्होंने ब्रिटिश इतिहास में सिख सैनिकों की गौरवपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए पूछा कि ब्रिटिश सेना में एक विशेष सिख रेजिमेंट की मांग पर अब तक क्या ठोस प्रगति हुई है.

इतिहास सिर्फ किताबों में क्यों रहे?- रक्षा मंत्री

रक्षा मंत्री कोकर ने इस मुद्दे पर बेहद सकारात्मक रुख अपनाते हुए कहा, "मैं लॉर्ड सहोता से इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने को तैयार हूं." उन्होंने 15 अगस्त को मनाए जाने वाले 'विक्ट्री ओवर जापान डे (VJ Day)' पर सिख सैनिकों की भूमिका को सम्मान देने का संकल्प भी दोहराया.

उन्होंने कहा कि सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि ब्रिटिश सेना में सेवा दे रहे सिख और अन्य धार्मिक समुदायों के सैनिकों के योगदान को कैसे अधिक सार्थक रूप से पहचान और सम्मान दिया जाए.

गोरखा ब्रिगेड की तर्ज पर हो सकती है सिख रेजिमेंट

सरकारी सूत्रों के अनुसार, अगर सिख रेजिमेंट का गठन होता है तो यह नेपाल की प्रसिद्ध गोरखा ब्रिगेड की तर्ज पर हो सकता है- एक ऐसी यूनिट जो विशिष्ट पहचान, परंपरा और गर्व का प्रतीक मानी जाती है.

यह सिर्फ सैन्य ढांचे का विस्तार नहीं होगा, बल्कि ब्रिटिश सेना और भारतीय उपमहाद्वीप के समुदायों के बीच ऐतिहासिक संबंधों की नई पुनर्परिभाषा होगी.

संख्या में कम: सिख सैनिकों की वर्तमान स्थिति

ब्रिटेन की रक्षा सेवाओं में वर्तमान में लगभग 160 सिख सैनिक सक्रिय सेवा में हैं. 2019 में यह संख्या 130 थी. यानी, पिछले पांच वर्षों में धीरे-धीरे ही सही, सिख समुदाय की उपस्थिति में वृद्धि हुई है, लेकिन यह अब भी सेना की कुल संख्या का बहुत छोटा हिस्सा है.

ऐसे में, एक अलग सिख रेजिमेंट की मांग न केवल सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बन चुकी है, बल्कि सैन्य विविधता को सम्मान देने का भी प्रतीक बन रही है.

पहली बार नहीं उठी ये मांग, लेकिन अब सुनवाई के आसार

यह कोई नई मांग नहीं है. 2015 में भी तत्कालीन रक्षा मंत्री मार्क फ्रांस्वा ने हाउस ऑफ कॉमन्स में यह मुद्दा उठाया था. उस समय सेना प्रमुख जनरल निकोलस कार्टर ने भी इस पर सकारात्मक विचार रखने की बात कही थी.

पूर्व रक्षा मंत्री सर निकोलस सोम्स ने सिख रेजिमेंट के गठन का समर्थन करते हुए कहा था कि राजनीतिक औपचारिकताओं को दरकिनार कर यह कदम उठाया जाना चाहिए. उन्होंने सिख समुदाय की पीढ़ियों से चली आ रही वीरता और वफादारी की प्रशंसा की थी.

लेकिन समय के साथ यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया. अब, लेबर सरकार और सिख सांसदों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के साथ, इस विषय पर व्यवहारिक कार्रवाई की उम्मीदें काफी मजबूत हो गई हैं.

इतिहास से वर्तमान तक: सिख सैनिकों का सैन्य योगदान

ब्रिटिश सेना और सिख समुदाय का रिश्ता 19वीं सदी के मध्य से चला आ रहा है. 1849 में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा सिख साम्राज्य (पंजाब) के अधिग्रहण के बाद, सिखों की भर्ती ब्रिटिश भारतीय सेना में बड़े पैमाने पर शुरू हुई.

ब्रिटिश शासकों ने 'मार्शल रेस' की अवधारणा के तहत सिखों, गोरखाओं, जाटों और राजपूतों जैसे समुदायों को सैन्य दृष्टि से उपयुक्त माना. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद, जब कई अन्य समुदायों की वफादारी पर संदेह हुआ, तब पंजाब के सिखों को वफादार साथी मानते हुए उनकी भर्ती में तेजी लाई गई.

इसका परिणाम यह हुआ कि 19वीं सदी के अंत तक सिख सैनिक ब्रिटिश भारतीय सेना की अनेक रेजिमेंटों, जैसे सिख रेजिमेंट, पंजाब रेजिमेंट और बॉम्बे आर्मी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे.

विश्व युद्धों में सिखों की भूमिका: संख्या से ज्यादा योगदान

प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918): करीब 1 लाख सिख सैनिकों ने ब्रिटिश सेना की ओर से हिस्सा लिया. वे फ्रांस के वेस्टर्न फ्रंट, गैलीपोली, मेसोपोटामिया, पूर्वी अफ्रीका और मिडिल ईस्ट जैसे कठोर मोर्चों पर लड़े.

उल्लेखनीय बात यह है कि उस समय सिख आबादी भारत की कुल जनसंख्या का केवल 2% थी, फिर भी वे ब्रिटिश भारतीय सेना का 20% हिस्सा थे.

द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945): इसमें करीब 3 लाख सिख सैनिकों ने भाग लिया. उन्होंने बर्मा, उत्तरी अफ्रीका, इटली और दक्षिण पूर्व एशिया के कई मुश्किल युद्धक्षेत्रों में लड़ाई लड़ी और वीरता के लिए सम्मानित भी हुए.

'सिख रेजिमेंट' की ऐतिहासिक वापसी का समय?

आज, जब विविधता और समावेशन (inclusion) की बात हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर हो रही है, तब ब्रिटिश सेना में एक ‘सिख रेजिमेंट’ की बहाली सिर्फ प्रतीकात्मक निर्णय नहीं होगी, बल्कि यह ऐतिहासिक न्याय और सम्मान की दिशा में एक ठोस कदम होगा.

सिख समुदाय न केवल अपने परंपरागत सैन्य गौरव के लिए जाना जाता है, बल्कि ब्रिटिश समाज में व्यवसाय, राजनीति, समाजसेवा और विज्ञान जैसे हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है. एक समर्पित रेजिमेंट उनके योगदान को वह मान्यता दे सकती है, जिसकी वे लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं.

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