नई दिल्ली/पटना : बिहार में नीतीश सरकार की ओर से आरक्षण का दायरा बढ़ाकर 65% करने के फैसले को पटना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है. नीतश सरकार ने ये कदम जातीय सर्वे के आधार पर सामने आए आकड़ों के आधार पर उठाया था. पहले आरक्षण का दायरा 50 फीसदी था.
न्यायालय ने बिहार पदों और सेवाओं में रिक्तियों के लिए आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 और बिहार (शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में) आरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2023 को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता क्लाज का उल्लंघन करने वाला करार देते हुए खारिज कर दिया.
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पटना उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायधीश के बेंच ने नीतीश सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिया. अदालत ने राज्य सरकार की ओर से लाए गए कानून को रद्द कर दिया है.
इससे पहले गौरव कुमार व अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर फैसले को सुरक्षित रखा गया था, जिसे आज सुनाया गया है.
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बिहार की नीतीश सरकार ने 2023 में बनाया था कानून
नीतीश की महागठबंधन वाली सरकार जिसमें आरजेडी और कांग्रस व अन्य दल शामिल थे, उसकी कैबिनेट ने 7 नवंबर 2023 को जातिगत सर्वे के आधार पर विधानसभा में कानून पास किया था. इसमें ओबीसी को 12 फीसदी का आरक्षण बढ़ाकर 18 फीसदी, ईबीसी के 18 फीसदी आरक्षण को बढ़ाकर 25 फीसदी, एससी के 16 फीसदी आरक्षण को बढ़ाकर 20 प्रतिशत करने और एसटी का आरक्षण 1 फीसदी से बढ़ाकर 2 फीसदी करने का प्रावधान था. 9 नवंबर 2023 को यह विधानसभा में पास हो गया था. राज्यपाल ने इसे 21 नवंबर को मंजूरी दे दी थी, जिसके बाद यह कानून बन गया था.
पटना हाईकोर्ट ने अब 9 नवंबर 2023 को बनाए कानून को रद्द कर दिया है. इस कानून के तहत ओबीसी, ईबीसी, एससी और एसटी को 65 फीसदी आरक्षण है, जबकि सवर्णों को 35 नौकरी पर हक दिया गया था.
यूथ फॉर इक्वलिटी ने दी थी चुनौती
इस कानून को आरक्षण खिलाफ रहने वाले संगठन यूथ फॉर इक्वैलिटी ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. इसमें सुप्रीम कोर्ट के द्वारा आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक न देने के फैसले को आधार बनाया गया था और इसे रद्द करने की मांग की गई थी. चीफ जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस हरीश कुमार की पीठ ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन बताकर रद्द कर दिया है. अब मान जा रहा है कि राज्य सरकार इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी.
इससे पहले वकील दीनू कुमार ने सवर्णों को आर्थिक आधार पर दिए जाने वाले 10 फीसदी आरक्षण को संविधान के खिलाफ बताया था. उन्होंने कहा था यह संविधान की धारा 14 और 15(6)(B) के खिलाफ है. इस दौरान उन्होंने कहा था कि जातिगत आरक्षण जातियों के आनुपात के आधार पर लिया गया है न कि सरकारी नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व के आधार पर.
वहीं यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है, जिसमें 50 फीसदी से ऊपर आरक्षण पर विचार किया जाना है.
देश में 50 फीसदी से ऊपर आरक्षण की इजाजत नहीं
अभी देशभर में 49.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. इसमें पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी, एससी के लिए 15 फीसदी और एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है.
इसके अलावा मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए भी 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया है. सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2022 में आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण को संविधान के मुताबिक बताया था.
इंदिरा साहनी मामले में 1992 में तय की गई थी 50 फीसदी लिमिट
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने 1992 में इंदिरा साहनी केस में आरक्षण को 50 फीसदी के ऊपर न ले जाने का फैसला दिया था. हालांकि तमिलनाडु में 69 प्रतिशत आरक्षण है, जो कि संविधान में 76वें संशोधन कर इसे 9वीं अनुसूची में डाल गया था. संविधान की इस अनुसूची में कुल 284 कानून डाले गए हैं.
वहीं नीतीश कुमार महागठबंधन में रहते हुए और अब एनडीए में वापस आने के बाद भी बिहार के नये आरक्षण कानून को संविधान की 9वीं अनुसूची में डालने की मांग लगातार केंद्र से करते रहे हैं. इस अनुसूची में डाले गए कानून की आमतौर पर न्यायिक समीक्षा नहीं होती और उसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 9वीं अनुसूची में किसी कानून को डालने को भी अपने समीक्षा के दायरे आने की बता कही है.
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