'ये लोकसभा है, यहां किसी की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर चर्चा नहीं...', अमित शाह ने राहुल गांधी पर साधा निशाना

लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया. इससे पहले लोकसभा सदन में गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन हुआ. अमित शाह ने स्पीकर के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव सामान्य घटना नहीं है.

Amit Shah targeted Rahul Gandhi in Lok Sabha over No-Confidence Motion
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नई दिल्ली: लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष की ओर से लाया गया अविश्वास प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हो गया. इससे पहले लोकसभा सदन में गृह मंत्री अमित शाह का संबोधन हुआ. अमित शाह ने स्पीकर के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव सामान्य घटना नहीं है. करीब 4 दशक बाद एक बार फिर से लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया. ये अफसोसजनक घटना है. स्पीकर किसी दल के नहीं बल्कि सदन के होते हैं. सदन के सभी सदस्यों के अधिकारों के संरक्षक होते हैं. उन्होंने कहा कि अनुशासन नहीं तो माइक बंद होगा. जब कोई नियमों को नजरअंदाज करेगा तो स्पीकर के पास ये अधिकार है कि उसे रोके-टोके और निकालकर बाहर करे. उन्होंने कहा कि ये लोग चर्चा करना ही नहीं चाहते. जब बोलने का मौका आता है तो राहुल गांधी जर्मनी, लंदन में होते हैं. संसद में किसी की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बहस नहीं हो सकती है. उन्होंने कहा कि विपक्ष हर संस्था पर सवाल खड़ा करता है. ये सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और स्पीकर पर तक शंका करता है.

शाह ने कहा, सदन में दस घंटे से ज्यादा चर्चा हुई है. 42 से ज्यादा सांसदों ने अपनी बात रखी है. पूरे सदन को बताना चाहता हूं कि स्पीकर की जब नियुक्ति हुई तब दोनों दलों के नेताओं (नेता सदन और नेता प्रतिपक्ष) ने एक साथ उनको आसन पर बैठाने का काम किया, इसका मतलब है कि पक्ष और विपक्ष दोनों ने समर्थन किया.

दुनिया में हमारी साख है

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा, स्पीकर के फैसले पर असहमति तो व्यक्त हो सकती है. इससे विपरीत विपक्ष ने स्पीकर की निष्ठा पर सवालिया निशान खड़ा किया. लोकसभा देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत है. दुनिया में हमारी साख है. जब इस पंचायत के मुखिया पर, उसकी निष्ठा पर सवाल उठाया जाता है तो पूरी दुनिया में हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा होता है. ये लोग चेंबर में जाते हैं तो उन्हें अपनी सुरक्षा की फिक्र होती है. स्पीकर का पद पार्टी से ऊपर होता है.

सदन आपसी विश्वास से चलता है

अमित शाह ने कहा, 75 साल से दोनों सदनों ने लोकतंत्र की नींव को गहरा बनाया है लेकिन विपक्ष ने इस पर सवाल खड़े कर दिए हैं. सदन आपसी विश्वास से चलता है. पक्ष और विपक्ष के लिए स्पीकर अभिभावक होते हैं. लोकसभा कैसे चलनी है इसके लिए नियम बनाए गए हैं. सदन कोई मेला नहीं, यहां नियम के हिसाब से बोलना होता है.

रोकना-टोकना स्पीकर का दायित्व

उन्होंने कहा, जब आप सदन के नियमों को नजरअंदाज करोगे तो स्पीकर का दायित्व है कि उसे रोके-टोके और निकालकर बाहर करे. ये अधिकार, ये नियम हमारे समय में नहीं बने, ये नियम नेहरू के समय के हैं. यहां अपनी मर्जी से नहीं बोला जा सकता है. स्पीकर जब फैसला देते हैं तो हो सकता है सत्ता पक्ष और विपक्ष को मंजूर ना हो लेकिन निर्णय पर शंका नहीं कर सकते.

बिरला साहब को मोरल ग्राउंड मत सिखाइए

अमित शाह ने कहा कि हमें अधिकार मिले हैं लेकिन कोई विशेषाधिकार नहीं है. अविश्वास प्रस्ताव रोज मर्रा की चीज नहीं है. पहले तीन बार जब अविश्वास प्रस्ताव आए तब चर्चा के दौरान स्पीकर आसन ग्रहण नहीं करेंगे. एकमात्र स्पीकर ओम बिरला हैं जिन्होंने आसन नहीं ग्रहण किया. बिरला साहब को मोरल ग्राउंड मत सिखाइए.

अमित शाह ने कहा, विपक्ष में इतनी गंभीरता नहीं है कि नियमों के हिसाब से अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है. फिर भी इनको मौका दिया. ये मोरल ग्राउंड की बात करते हैं. सदन में गंभीरता की बात करते हैं. बिरला जी ने इनको गलती सुधारने का मौका दिया. जो ये प्रस्ताव लाए वो नियम अनुसार ही नहीं है.

ये कहते हैं कि बोलने का मौका नहीं मिलता

अमित शाह ने कहा, ये हमें परंपराएं सिखाते हैं. ये कहते हैं कि बोलने का मौका नहीं मिलता है. नए सदस्यों को बोलने का अधिकार मिलना चाहिए. जो लोग ये कहते हैं कि हमें बोलने नहीं दिया जा रहा है ये कहने से बीजेपी की छवि को नुकसान पहुंचाने की मंसूबे कामयाब नहीं होंगे. हमने कभी विपक्ष की आवाज दबाने का काम नहीं किया. विपक्ष की आवाज दबाने का काम तो इमरजेंसी में हुआ था. सदन में सदस्य का आचरण कैसा हो… ये तय करने का अधिकार पीठ के पास है. इसका फैसला करने का अधिकार आसन के पास है.

विपक्ष के नेता बताएं वो कितना बोले हैं?

शाह ने कहा, विपक्ष के नेता कहते हैं कि उनको बोलने नहीं दिया जाता. जब बोलने का मौका आता है तो जर्मनी और लंदन में होते हैं. फिर शिकायत करते हैं. 18वीं लोकसभा में 157 घंटे और 55 मिनट कांग्रेस के सदस्य बोले, विपक्ष के नेता बताएं वो कितना बोले हैं. ये बस लोकसभा को बदनाम करने के लिए ऐसा कहते हैं. आपकी पार्टी से कौन बोलेगा ये तय करने का अधिकार आपका है. अविश्वास प्रस्ताव पर क्यों नहीं बोलते. ये बोलना नहीं चाहते.

क्या मैं राहुल से कह सकता हूं कि पहले ये बोलिए?

उन्होंने कहा, अगर बोलना चाहते हैं तो नियम के अनुसार नहीं बोलना चाहते. कांग्रेस कहती है कि विपक्ष के नेता को बोलने नहीं दिया जाता, टोका जाता है. जब आप अप्रकाशित किताब को कोट करोगे तो आपको टोका जाएगा. क्या मैं राहुल गांधी से कह सकता हूं कि आप पहले ये बोलिए वो बाद में बोलिए. फिर कहा कि मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस पर बहस हो. ये लोकसभा है. किसी की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर लोकसभा में चर्चा नहीं होती है.

सच है कि ये बोलना नहीं चाहते

अमित शाह ने लोकसभा में राहुल गांधी की अटेंडेंस को लेकर भी हमला बोला. इस पर कांग्रेस सांसदों ने विरोध किया और कहा कि ये प्रस्ताव स्पीकर के खिलाफ आया है ना कि नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ. इसके बाद अमित शाह ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में इन्होंने हिस्सा नहीं लिया. एक भी सरकारी विधेयक पर चर्चा में हिस्सा नहीं लिया है. इनकी पार्टी 4 दशक के बाद ऐसा प्रस्ताव लेकर आती है, इस पर भी इन्होंने हिस्सा नहीं लिया. ये कहते हैं कि बोलने नहीं दिया जाता जबकि सच है कि ये बोलना नहीं चाहते. पूरे शीतकालीन सत्र में गैरहाजिर रहे.

अगर ये देश में नहीं थे तो कहां थे?

अमित शाह ने कहा, राहुल गांधी, हो सकता है अपनी पार्टी के प्रचार के लिए उन्हें देश भर में कहीं जाना पड़ता है. ये स्वाभाविक है. पर बात ये है कि ये यहां (देश) नहीं थे तो कहां थे. हर बजट सत्र में ये विदेश यात्रा पर थे. जब जब बजट सत्र आता है तो इनकी विदेश यात्रा होती है. अब विदेश से कैसे बोलेगो. यहां वीडियो कॉन्फ्रेंस का कोई प्रावधान नहीं है. आज जब स्पीकर के आचरण पर सवाल खड़ा कर रहा है. आचरण केवल स्पीकर का नहीं देखा जाता है. कभी अपनी भी आचरण पर बात करो. दौड़कर आते हो और पीएम के गले लग जाते हो. कभी सदन में फ्लाइंग किस करोगे. सदन में आंख मटकाओगे और सवाल उठाओगे स्पीकर के कंडक्ट पर.

उन्होंने कहा कि जब हम किसी को एक उंगली दिखाते हैं तो चार उंगलियां अपनी ओर उठती हैं. ये बात करते हैं स्पीकर के कंडक्ट की. ये विरोध करते-करते भारत का विरोध करने लगते हैं. अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाए हैं क्योंकि इन्हें चुनाव में कहीं सफलता नहीं मिलती है. ये स्पीकर पर संदेह करते हैं, चुनाव आयोग पर संदेह करते हैं. सुप्रीम कोर्ट पर संदेह करते हैं.

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