बिहार की तरह झारखंड में भी जातीय सर्वे कराने का फैसला, CM चंपाई सोरेन ने दी मंजूरी

इससे पहले झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने भी जातिगत सर्वे के लिए मोदी सरकार को पत्र लिखा था और पिछड़े वर्गों के लिए इसे जरूरी बताया था. 

बिहार की तरह झारखंड में भी जातीय सर्वे करने का फैसला, CM चंपाई सोरेन ने दी मंजूरी
5 फरवरी 2024 को फ्लोर टेस्ट के दौरान मौजूदा सीएम चंपाई सोरेन | Photo- ANI

नई दिल्ली/रांची : बिहार के बाद झारखंड जातिगत सर्वे होगा. राज्य के चंपाई सोरेन सरकार ने इस फैसले पर मुहर लगा दी है. चंपाई सोरेने की कैबिनेट ने 33 प्रस्ताव मंजूर किए हैं लेकिन जातिगत सर्वे सबसे अहम है. 

गौरतलब है लोककसभा चुनाव 2024 में INDIA गठबंधन ने जाति जनगणना को सबसे अहम मुद्दा बनाया था. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे पूरे चुनावी कैंपने में प्रमुखता से उठाया था. वहीं राज्य में विधानसभा चुनाव भी नजदीक आ रहा है जिससे ये मुद्दा चंपाई सोरेन सरकार के लिए और भी अहम हो जाता है. 

चंपाई सोरेन सरकार ने इस सर्वे की जिम्मेदारी कार्मिक विभाग को दी है, लेकिन सर्वे कराने की तारीख अभी तय नहीं की गई है. 

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इसी साल झारखंड में होना है विधानसभा चुनाव

2024 के अंत में राज्य में विधानसभा चुनाव होना है, ऐसे में चंपाई सोरेन का फैसला काफी अहम हो जाता है. बिहार में महागठबंधन सरकार के दौरान जातिगत सर्वे हुआ था.

सीएम सोरेन भी कर चुके हैं जातिगत सर्वे का ऐलान

इससे पहले अभी जेल में बंद सीएम हेमंत सोरेन ने भी जातिगत सर्वे का ऐलान किया था. उन्होंने कहा था कि बिहार की तर्ज पर झारखंड में भी जातिगत सर्वे होगा. 

उन्हें राज्य में कथित जमीन से जुड़े घोटाले के मामले में गिरफ्तार किया गया है.

गौरतलब है कि 2 साल से ज्यादा समय पहले हेमंत सोरेन सभी दलों की सहमति पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जाति जनगणना की मांग की थी. झारखंड में सर्वदलीय सदस्यों ने एक बैठक कर 2021 में गृहमंत्री को इसकी मांग को लेकर पत्र सौंपा था. 

मुख्यमंत्री ने पत्र में कहा था कि संविधान में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण एवं विशेष सुविधा देने का प्रावधान है. आजादी के बाद जातिगत आकड़े न होने इन वर्गों को आरक्षण में विशेष सुविधा देना मुश्किल बना हुआ है. 

सीएम सोरेन ने कहा था- पिछड़े और अति पिछड़ों का विकास नहीं हो पा रहा

सीएम सोरेन पत्र में आगे कहा था कि पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग के लिए विकास नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे में बिना जाति जनगणना के पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों की सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का पता नहीं लगाया जा सकेगा. और न ही उनकी बेहतरी के लिए काम हो पाएगा.

बता दें के 1931 में पहली बार जाति जनगणना की गई तब अंग्रेजी हुकूमत थी. उसी के आधार पर मंडल कमीशन ने पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण देने की मांग की थी. 

हेमंत सोरेन ने कहा था- आर्थिक विषमता की बड़ी वजह है जातीय भेदभाव

सीएम ने पत्र में लिखा था कि भारत में आर्थिक विषमता का बहुत गहरा संबंध जातीय भेदभाव से जुड़ा है. इसी के कारण अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ी है. सामान्य तौर से देखें तो जो आर्थिक रूप से ज्यादा पिछड़े हैं वे पिछड़े वर्ग से आते हैं.

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