नई दिल्ली: मई 2025 में पाकिस्तान के खुज़दार शहर में एक स्कूल बस पर बम हमला हुआ. इस हादसे में कई मासूम जानें गईं. जैसे ही यह खबर पूरे देश में फैलनी शुरू हुई, पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी सामने आए और सीधे तौर पर भारत पर आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि यह हमला “भारतीय राज्य द्वारा प्रायोजित आतंकवाद” का हिस्सा है और इसे फ़ितना-अल-हिंदुस्तान नाम की बड़ी साजिश का हिस्सा बताया.
यह कोई पहली बार नहीं था जब पाकिस्तान की तरफ़ से ऐसा आरोप लगाया गया हो. पिछले एक साल में, पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसियों ने बलूचिस्तान में चल रही हिंसा और विद्रोह को इसी "फ़ितना-अल-हिंदुस्तान" नाम से जोड़ना शुरू कर दिया है.
क्या है “फ़ितना-अल-हिंदुस्तान”?
इस शब्द का इस्तेमाल पाकिस्तान की सरकार और सेना उन बलूच उग्रवादी समूहों के लिए कर रही है, जो उनके खिलाफ हथियार उठाए हुए हैं. पाकिस्तान का कहना है कि ये समूह भारत के इशारे पर काम कर रहे हैं और देश के अंदर अस्थिरता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन भारत इस तरह के आरोपों को सिरे से नकारता आया है. भारत का कहना है कि बलूचिस्तान की समस्या पाकिस्तान के अंदर की है, और इसके लिए विदेशी ताकतों को जिम्मेदार ठहराना केवल ध्यान भटकाने की कोशिश है.
कैसे बना यह शब्द एक सरकारी बयानबाज़ी का हिस्सा
2025 की शुरुआत से ही, पाकिस्तान की गृह मंत्रालय और सेना ने “फ़ितना-अल-हिंदुस्तान” को एक आधिकारिक बयानबाज़ी में बदल दिया. मार्च में जब जाफर एक्सप्रेस का अपहरण हुआ और जुलाई में बलूच विद्रोहियों द्वारा "ऑपरेशन बाम" नामक हमलों की श्रृंखला चली, तब पाकिस्तान सरकार ने इन सभी को भारतीय खुफिया एजेंसियों से जोड़ा. इस बयानबाज़ी का फायदा यह होता है कि लोगों का ध्यान बलूचिस्तान की असली समस्याओं से हटकर एक बाहरी दुश्मन पर केंद्रित हो जाता है यानी भारत.
सबूत कहां हैं?
जब बात सबूतों की आती है, तो पाकिस्तान की कहानी कमजोर दिखती है. न तो कोई अंतरराष्ट्रीय एजेंसी, न संयुक्त राष्ट्र और न ही किसी स्वतंत्र मीडिया संस्था ने अब तक यह साबित किया है कि भारत इन बलूच संगठनों को चला रहा है. दूसरी ओर, बहुत से दस्तावेज़ और रिपोर्टें मौजूद हैं जो दिखाती हैं कि बलूचिस्तान में स्थानीय लोगों की शिकायतें, उत्पीड़न, और मानवाधिकार उल्लंघन ही इस संघर्ष की असली जड़ हैं.
बलूचिस्तान की जनता की पीड़ा
पिछले कई वर्षों से बलूचिस्तान में लोगों को जबरन लापता करने की घटनाएं हो रही हैं. पाकिस्तान का अपना आयोग खुद मानता है कि हजारों लोग गायब हैं, जिनमें बड़ी संख्या बलूचिस्तान से है. एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे संगठनों ने बार-बार कहा है कि यहां मनमानी गिरफ्तारियां, फर्जी मुठभेड़ें और इंटरनेट बंद करना आम बात हो गई है. ये सभी कदम कथित रूप से विद्रोह को रोकने के लिए उठाए जाते हैं, लेकिन असल में इससे आम लोग ही परेशान होते हैं.
2006 से जारी संघर्ष की चौथी लहर
बलूचिस्तान में मौजूदा विद्रोह को चौथी लहर कहा जाता है. इसकी शुरुआत 2006 में तब हुई जब नवाब अकबर बुगती की मौत सेना के हाथों हुई. वह बलूचिस्तान के पूर्व गवर्नर थे और स्वायत्तता की मांग कर रहे थे. उनकी मौत ने पूरे इलाके में गुस्से की आग भड़का दी.
इस घटना के बाद कई उग्रवादी संगठन जैसे BLA (बलूच लिबरेशन आर्मी) और BLF (बलूच लिबरेशन फ्रंट) बने और आंदोलन तेज़ हो गया. हालांकि अब आंदोलन सिर्फ बंदूक तक सीमित नहीं रहा. इसमें अब छात्र, महिलाएं और नागरिक समाज के लोग भी शामिल हैं, जो लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज़ उठा रहे हैं.
इंटरनेट बंद और जनता की परेशानी
2025 के अगस्त में, सरकार ने सुरक्षा का हवाला देकर पूरे बलूचिस्तान में मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया. यह बंदी लगभग तीन हफ्ते चली. इस दौरान लोगों को न सिर्फ व्यापार में दिक्कत हुई, बल्कि छात्र ऑनलाइन क्लास नहीं कर सके और लोग अपने विदेश में बसे रिश्तेदारों से भी संपर्क नहीं कर पाए. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे "सामूहिक सज़ा" बताया.
डॉ. माहरंग बलोच: एक शांतिपूर्ण संघर्ष की आवाज़
इस पूरे संघर्ष में डॉ. माहरंग बलोच का नाम सबसे ज्यादा सामने आया. वह एक मेडिकल ग्रेजुएट हैं और बलूच यकजेहती कमेटी की नेता हैं. उन्होंने बलूच लापता लोगों के लिए कई मार्च और प्रदर्शन आयोजित किए हैं. मार्च 2025 में उन्हें क्वेटा में विरोध के दौरान गिरफ्तार किया गया. लेकिन उनके शांतिपूर्ण आंदोलन को दुनिया ने देखा और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया. इससे पाकिस्तान सरकार के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुनौती मिली.
लेबल का असली मकसद क्या है?
“फ़ितना-अल-हिंदुस्तान” सिर्फ एक नाम नहीं है, यह एक ऐसा नैरेटिव है जिसे पाकिस्तान सरकार बलूच विद्रोह को "विदेशी साजिश" दिखाने के लिए इस्तेमाल कर रही है. इसका उद्देश्य है बलूच लोगों के असली दर्द, शिकायतें और अधिकार की मांग को गलत ठहराना. जब सरकार किसी आंदोलन को बाहर से संचालित बता देती है, तो उसे कुचलने के लिए कठोर कदम उठाना आसान हो जाता है. लेकिन इससे समस्या का हल नहीं निकलता उल्टा हालात और बिगड़ते हैं.
निष्कर्ष: क्या सच्चाई इतनी सीधी है?
बलूचिस्तान की स्थिति किसी प्रचार की पोस्टर लाइन से नहीं समझी जा सकती. यह एक जटिल समस्या है, जिसमें कई परतें हैं ऐतिहासिक अन्याय, राजनीतिक उपेक्षा, संसाधनों पर अधिकार, और पहचान की लड़ाई. भारत और पाकिस्तान की राजनीति अपनी जगह है, लेकिन बलूचिस्तान के लोगों की जिंदगी, उनकी मांगें, और उनका संघर्ष सिर्फ एक “फ़ितना” नहीं, बल्कि सुनने लायक एक आवाज़ है.
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