पाकिस्तान की बर्बादी तय! IMF की ये शर्त शहबाज की कुर्सी खींच लेंगी, इधर कुआं-उधर खाई वाली हालत!

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबारने के लिए कर्ज की मंजूरी तो दे दी है, लेकिन इस राहत के बदले में उसने कुछ कड़े आर्थिक सुधारों की मांग रखी है.

Pakistan destruction certain IMF conditions Shehbaz
शहबाज शरीफ | Photo: ANI

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबारने के लिए कर्ज की मंजूरी तो दे दी है, लेकिन इस राहत के बदले में उसने कुछ कड़े आर्थिक सुधारों की मांग रखी है. इनमें सबसे विवादास्पद शर्त है – देश के सभी प्रांतों में कृषि आय पर टैक्स लगाना. यह शर्त जून तक पूरी नहीं हुई, तो अगली किश्त रुक सकती है. लेकिन, इस एक मांग ने पाकिस्तान की सरकार को न केवल प्रशासनिक, बल्कि राजनीतिक संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है.

कृषि टैक्स: आर्थिक सुधार या राजनीतिक विस्फोट?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन परंपरागत रूप से यह कर-मुक्त रहा है. इसका कारण स्पष्ट है — देश की अधिकांश उपजाऊ जमीनें प्रभावशाली जमींदारों के हाथों में हैं, जो या तो स्वयं सत्ता में हैं या सत्ताधारियों के करीबी माने जाते हैं. इनमें से कई सांसद, मंत्री या सैन्य संस्थानों में ऊंचे पदों पर काबिज हैं. ऐसे में इस वर्ग पर टैक्स लगाना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक ‘आत्मघाती’ कदम हो सकता है.

गांवों में उबाल, कट्टरपंथ को मौका

अगर सरकार कृषि आय पर टैक्स लगाती है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ेगा. पहले से आर्थिक दबाव झेल रहे किसान इसे शहरी वर्ग और सत्ताधारियों की साजिश मान सकते हैं. पाकिस्तान की राजनीति में अक्सर यह धारणा रही है कि ‘शहरी विकास की कीमत ग्रामीणों को चुकानी पड़ती है.’ ऐसे में इस टैक्स को लेकर व्यापक असंतोष फैल सकता है.

चिंता की एक और वजह यह भी है कि कट्टरपंथी और इस्लामी संगठन इस असंतोष को भुनाने के लिए पहले से तैयार बैठे हैं. वे टैक्स को ‘शरीयत के खिलाफ ज़ुल्म’ बता कर जनता को भड़का सकते हैं, जिससे मामला धार्मिक रंग ले सकता है और देश में अशांति फैल सकती है.

संविधान और संरचना के बीच टकराव

गौरतलब है कि पाकिस्तान में कृषि टैक्स लगाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं, बल्कि प्रांतीय सरकारों के पास है. लेकिन IMF से किया गया समझौता केंद्र सरकार ने किया है. ऐसे में अगर कोई प्रांत इस फैसले को मानने से इनकार कर देता है, तो पाकिस्तान की सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असहाय दिखाई दे सकती है. इससे न केवल कर्ज की अगली किश्त रुक सकती है, बल्कि वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं.

महंगाई और खाद्य संकट का डर

कृषि क्षेत्र पर कर लगाए जाने का सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ेगा, जिससे खाद्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं. पहले से ही महंगाई की मार झेल रही जनता पर इसका और बोझ बढ़ेगा. इसका नतीजा होगा — सामाजिक तनाव, विरोध प्रदर्शन और सरकार के खिलाफ जनाक्रोश.

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