Aliban Peace Talks: तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में आयोजित पाकिस्तान-अफगानिस्तान शांति वार्ता एक बार फिर विफल हो गई है. दो दशक से ज़्यादा समय से सीमाओं पर खिंची तल्ख़ी और आतंकवाद की परछाइयों के बीच इस वार्ता को उम्मीद की किरण माना जा रहा था, लेकिन अंत में यह भी संदेह और अविश्वास की भेंट चढ़ गई.
बैठक का मक़सद था, दोनों देशों के बीच सीमा पर जारी तनाव को कम करना और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की बढ़ती गतिविधियों पर साझा रणनीति बनाना. लेकिन सूत्रों के मुताबिक, वार्ता तब टूट गई जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान की सीमा में घुसकर TTP के ठिकानों पर कार्रवाई की अनुमति मांग डाली. काबुल ने इस प्रस्ताव को अपनी संप्रभुता पर हमला मानते हुए सख्त विरोध किया.
बातचीत बनी बहस, बहस बनी टकराव
सूत्र बताते हैं कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच तीखी बहस हुई. अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि उसकी जमीन पाकिस्तान विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होगी. इसके बदले में काबुल ने मांग रखी कि पाकिस्तान अपने हवाई क्षेत्र के उल्लंघन बंद करे और अमेरिकी ड्रोन उड़ानों पर रोक लगाए.
शुरुआत में पाकिस्तान सहमत होता दिखा, लेकिन अचानक एक “अज्ञात कॉल” के बाद उसका रुख बदल गया. एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, उस कॉल के बाद पाकिस्तान ने पहली बार स्वीकार किया कि वह एक विदेशी देश (संकेत: अमेरिका) के साथ ड्रोन ऑपरेशन समझौते में है, जिसे रद्द नहीं किया जा सकता. यही खुलासा वार्ता के टूटने की जड़ बना.
“हम झुकना नहीं जानते”
पाकिस्तान के इस रुख से नाराज़ अफगान प्रतिनिधिमंडल ने बैठक से दूरी बना ली. तुर्की और कतर, जो मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे, दोनों भी इस घटनाक्रम से हैरान रह गए. इसके बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अफगानिस्तान को “पाकिस्तान का प्यादा” कहकर विवाद को और भड़का दिया. उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान पर हमला हुआ, तो “पचास फीसदी ज्यादा ताक़त से जवाब दिया जाएगा.”
जवाब में अफगान गृह मंत्रालय के प्रवक्ता अब्दुल मतीन कानी ने कहा, “हमारे पास परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन अफगानियों ने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया. जो पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए काफी है.”
अफगान रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याक़ूब मुजाहिद ने भी स्पष्ट कहा, “TTP पाकिस्तान की आंतरिक समस्या है. उसके सदस्य पाकिस्तानी नागरिक हैं, जिन पर कार्रवाई अफगानिस्तान का अधिकार क्षेत्र नहीं.”
दक्षिण एशिया के लिए कूटनीतिक झटका
इस्तांबुल की इस विफल वार्ता ने एक बार फिर पाकिस्तान की ‘दोहरी नीति’ को उजागर कर दिया है, जो एक ओर शांति की बात करता है, और दूसरी ओर अपने पड़ोसी की संप्रभुता पर अतिक्रमण की कोशिश करता है.
यह वार्ता न केवल काबुल-इस्लामाबाद संबंधों के लिए, बल्कि भारत, अमेरिका, तुर्की और कतर जैसे क्षेत्रीय और वैश्विक खिलाड़ियों के लिए भी कूटनीतिक झटका मानी जा रही है. अब सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान और अफगानिस्तान कभी एक स्थायी समाधान तक पहुंच पाएंगे, या फिर यह रिश्ता यूं ही “शांति की कोशिशों के मलबे” के नीचे दबा रहेगा?
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