India-US Trade Deal: नई दिल्ली में म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर बड़ा बयान दिया है. 5 अक्टूबर को उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात और मांगें सामने रख चुके हैं. ऐसे में अब आगे किसी बड़ी रियायत पर सहमत होना आसान नहीं होगा. हालांकि, उन्होंने साफ किया कि ट्रेड डील अभी फाइनल नहीं हुई है और बातचीत जारी है.
दोनों देशों के बीच बातचीत जारी
निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बातचीत काफी मुश्किल और लंबी रही है. दोनों देश अब ऐसे पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां आगे कुछ देना या लेना आसान नहीं दिख रहा है. फिर भी अगर किसी मुद्दे पर समझौते की गुंजाइश बचती है तो दोनों पक्ष उस पर बातचीत कर सकते हैं.
वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच ट्रेड बैलेंस फिलहाल भारत के पक्ष में है. अमेरिका भारत के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है और इसी वजह से वह भारत से कुछ रियायतों की उम्मीद कर रहा है. चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जुलाई के बीच भारत ने अमेरिका को 34.5 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि अमेरिका से 22.2 अरब डॉलर का आयात हुआ. इस तरह भारत को करीब 12.3 अरब डॉलर का ट्रेड सरप्लस मिला.
फरवरी 2026 में बना था ट्रेड डील का फ्रेमवर्क
भारत और अमेरिका के बीच मौजूदा बातचीत फरवरी 2026 में तय किए गए शुरुआती ट्रेड एग्रीमेंट के फ्रेमवर्क पर आधारित है. उस समय दोनों देशों ने टैरिफ कम करने, व्यापार से जुड़ी रुकावटें घटाने और एक-दूसरे के बाजार में बेहतर पहुंच देने जैसे मुद्दों पर आगे बढ़ने की सहमति जताई थी. साथ ही सप्लाई चेन को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया था.
इस बातचीत की शुरुआत फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बातचीत के बाद हुई थी. आगे डिजिटल ट्रेड और बाजार में पहुंच से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी चर्चा होनी है.
निर्मला सीतारमण ने टैरिफ पर उठाए सवाल
वित्त मंत्री ने व्यापार घाटे को कम करने के लिए टैरिफ के बढ़ते इस्तेमाल पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि पहले टैरिफ का इस्तेमाल बातचीत के दौरान व्यापार से जुड़े मतभेदों को सुलझाने के लिए किया जाता था, लेकिन अब इसका इस्तेमाल दबाव बनाने के तरीके के तौर पर ज्यादा होता दिख रहा है.
चीन के साथ भारत के ट्रेड डेफिसिट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से यह अंतर काफी बढ़ा है. उन्होंने सवाल किया कि अगर भारत भी चीन के साथ इसी तरह टैरिफ को दबाव के तौर पर इस्तेमाल करे तो क्या यह सही तरीका होगा. उनके मुताबिक, व्यापार से जुड़े मतभेदों को बातचीत और दोनों तरफ से उचित रियायत के जरिए सुलझाने की कोशिश होनी चाहिए.
भारत-EU ट्रेड डील पर भी ध्यान
भारत और यूरोपीय संघ के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत 27 जनवरी 2026 को पूरी हुई थी. इसके बाद सितंबर में यूरोपीय आयोग ने समझौते को आगे बढ़ाने के लिए EU काउंसिल के सामने प्रस्ताव रखा. निर्मला सीतारमण ने कहा कि ऐसे व्यापार समझौतों में सप्लाई चेन को मजबूत करना जरूरी है. पुराने कारोबारी रिश्तों में अगर किसी वजह से बदलाव आ रहा है तो नए साझेदार और नए रास्ते तलाशने की जरूरत है.
वित्त मंत्री ने कहा कि ट्रेड डील का मकसद केवल व्यापार बढ़ाना नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच मौजूद असंतुलन को बातचीत के जरिए कम करना भी है. इसके लिए देश एक-दूसरे के बाजार में अपने सामान की पहुंच बढ़ाते हैं. भारत-EU समझौते का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें भारत ने अपने जरूरी सेक्टरों के हितों का ध्यान रखा है.
उन्होंने इस समझौते को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ बताया और कहा कि भारत और EU की अर्थव्यवस्थाएं मिलकर दुनिया की करीब एक चौथाई GDP में योगदान देती हैं. उन्होंने बताया कि डेयरी, कृषि और सोया जैसे संवेदनशील सेक्टरों को समझौते में सुरक्षा दी गई है.
निर्मला सीतारमण के मुताबिक, बदलते ग्लोबल ट्रेड माहौल को देखते हुए भारत हर व्यापार समझौते में अपने हितों का ध्यान रख रहा है. उन्होंने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि कई देशों ने अलग-अलग तरीकों से इन नियमों से हटकर कदम उठाए हैं.
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