Manisha Rani First Book ‘Munger Ki Rani’: रियलिटी शोज़ की दुनिया से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने वाली मनीषा रानी एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई शो या सोशल मीडिया पोस्ट नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी की कहानी है. बिग बॉस OTT सीजन 2 से घर-घर में पहचानी जाने वाली मनीषा रानी ने अब अपने संघर्ष, हौसले और सपनों को शब्दों का रूप दे दिया है. 28 साल की मनीषा ने अपनी पहली किताब ‘मुंगेर की रानी’ लॉन्च की है, जिसकी झलक उन्होंने खुद सोशल मीडिया पर अपने फैंस के साथ साझा की.
बिहार के छोटे से शहर मुंगेर से निकलकर मुंबई जैसे बड़े शहर में अपनी जगह बनाना आसान नहीं होता. मनीषा रानी की किताब ‘मुंगेर की रानी’ इसी कठिन और भावनात्मक सफर की कहानी है. इस किताब में उन्होंने बताया है कि कैसे सीमित संसाधनों, अकेलेपन और लगातार संघर्ष के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को ज़िंदा रखा. भोजपुरी एल्बम से लेकर रियलिटी शोज़ तक का उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि जुनून हो तो हालात भी रास्ता देने लगते हैं.
बिग बॉस से मिली पहचान, झलक में चमका सितारा
मनीषा रानी को असली पहचान बिग बॉस OTT 2 से मिली, जहां वह सेकेंड रनर-अप रहीं. इसके बाद ‘झलक दिखला जा 11’ की ट्रॉफी जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि वह सिर्फ एंटरटेनर ही नहीं, बल्कि मेहनती और टैलेंटेड कलाकार भी हैं. सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी पहले से ही मजबूत रही है, लेकिन अब उन्होंने अपने अनुभवों को किताब के ज़रिए साझा करने का फैसला किया है.
“मुंगेर से मुंबई जाना पागलपन लगता है”
अपनी किताब के प्रमोशन के दौरान मनीषा ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने अपने दिल की बात कही. उन्होंने बताया कि मुंगेर से मुंबई आने का फैसला सुनने में भले ही पागलपन लगे, लेकिन सपनों को सच करने का यही रास्ता था. मनीषा के शब्दों में, जब किसी के पास साथ देने वाला कोई नहीं होता, तब इंसान को खुद अपना सहारा बनना पड़ता है—और उन्होंने यही किया.
जब रोज़ जिंदा रहना ही बन गया था संघर्ष
किताब में मनीषा ने उन दिनों का ज़िक्र किया है जब मुंबई में रहना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया था. आर्थिक तंगी इतनी थी कि हर दिन खुद को संभालना मुश्किल हो जाता था. इसके बावजूद उन्होंने अपने हुनर को निखारने की कोशिश नहीं छोड़ी. हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, उनका फोकस हमेशा सीखने और आगे बढ़ने पर रहा.
500 रुपये की नौकरी से सपनों की उड़ान
मनीषा रानी ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि उन्होंने बैकग्राउंड आर्टिस्ट, वेट्रेस और बेहद कम पैसों वाली नौकरियां तक कीं. कभी 500 रुपये के लिए काम करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हालातों को अपने सपनों पर हावी नहीं होने दिया. मनीषा खुद को गर्व से बिहारी बताती हैं और कहती हैं कि उन्होंने हार मानना कभी नहीं सीखा.
छोटे शहरों की लड़कियों के लिए प्रेरणा
‘मुंगेर की रानी’ सिर्फ मनीषा रानी की कहानी नहीं है, बल्कि उन तमाम लड़कियों की आवाज़ है जो छोटे शहरों से बड़े सपने देखती हैं. मनीषा चाहती हैं कि उनकी किताब उन लड़कियों को हौसला दे, जो अपने सपनों को सच करना चाहती हैं लेकिन हालात से डर जाती हैं. उन्हें पूरा विश्वास है कि अगर जज़्बा सच्चा हो, तो एक दिन मंज़िल ज़रूर मिलती है.
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