Amrit Sarovar Scheme: देश में रोजगार की तलाश में गांव से शहरों की ओर पलायन लंबे समय से एक बड़ी सामाजिक समस्या रही है. इसे रोकने और ग्रामीण इलाकों में ही आजीविका के मजबूत साधन तैयार करने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. इन्हीं प्रयासों के तहत जल संरक्षण और ग्रामीण आय बढ़ाने को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने मिशन अमृत सरोवर की शुरुआत की है. इस योजना का उद्देश्य केवल पानी का संरक्षण करना नहीं है, बल्कि गांवों में रहने वाले किसानों और युवाओं के लिए मछली पालन जैसे व्यवसाय के नए अवसर तैयार करना भी है.
आज गांवों में लोग परंपरागत खेती के अलावा फिश फार्मिंग को भी एक बेहतर विकल्प के रूप में देख रहे हैं. कम जमीन, सीमित संसाधनों और कम लागत में शुरू होने वाला यह काम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकता है. अमृत सरोवर योजना इसी दिशा में एक अहम कदम साबित हो रही है.
क्या है मिशन अमृत सरोवर?
मिशन अमृत सरोवर केंद्र सरकार की एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका उद्देश्य देशभर में बड़े पैमाने पर जलाशयों और तालाबों का निर्माण व पुनर्विकास करना है. इसके तहत करीब 50 हजार तालाबों को विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. इन तालाबों का मुख्य उद्देश्य बारिश के पानी को संरक्षित करना है, ताकि गांवों में जल संकट से निपटा जा सके और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सके.
इन जलाशयों को केवल पानी जमा करने तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि उन्हें इस तरह तैयार किया जा रहा है कि किसान और ग्रामीण परिवार उनका उपयोग मछली पालन और जल आधारित कृषि गतिविधियों के लिए कर सकें. योजना का मूल मकसद यह है कि जल संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल हो और उसी के माध्यम से किसानों को स्थायी आमदनी के अवसर मिलें.
फिश फार्मिंग के लिए कैसे फायदेमंद है यह योजना?
अमृत सरोवर के तहत बनाए जा रहे तालाबों को वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन किया जाता है. इन तालाबों में पानी की उपयुक्त गहराई, साफ-सफाई की व्यवस्था, जल प्रवाह (वॉटर फ्लो) और सुरक्षा जैसे पहलुओं पर खास ध्यान दिया जाता है, ताकि ये तालाब मछली पालन के लिए पूरी तरह अनुकूल हों.
जो ग्रामीण या किसान फिश फार्मिंग शुरू करना चाहते हैं, उन्हें स्थानीय मत्स्य विभाग की ओर से ट्रेनिंग भी दी जाती है. इस प्रशिक्षण में मछली के सही बीज का चयन, मछलियों को दिए जाने वाले चारे का प्रबंधन, पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के तरीके और मछलियों में होने वाली बीमारियों से बचाव के उपाय सिखाए जाते हैं. इससे नए उद्यमियों को तकनीकी जानकारी मिलती है और नुकसान की आशंका कम होती है.
कई गांवों में मछली पालन को समूह के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है. सामूहिक रूप से काम करने से लागत का बोझ कम पड़ता है और उत्पादन की मात्रा बढ़ जाती है. इस मॉडल से छोटे किसान, सीमित जमीन वाले परिवार और बेरोजगार युवा बिना ज्यादा निवेश के अपनी आजीविका शुरू कर सकते हैं.
आर्थिक मदद और सरकारी सहयोग
सरकार मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराती है. तालाबों के निर्माण या उनके सुधार के लिए सब्सिडी दी जाती है. इसके अलावा मछली बीज, चारा और जरूरी उपकरणों की खरीद में भी आर्थिक सहयोग मिलता है. कई मामलों में बैंक लोन पर ब्याज में राहत और आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है.
कुछ राज्यों में फिश फार्मिंग को कृषि से जुड़ी गतिविधि मानते हुए विशेष अनुदान भी दिया जाता है. इसके साथ ही मछली को बाजार तक पहुंचाने के लिए परिवहन, भंडारण और बिक्री से जुड़ी सुविधाओं में भी सहयोग किया जाता है. योजना का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उत्पादन से लेकर बिक्री तक ग्रामीण उद्यमियों को ज्यादा कठिनाइयों का सामना न करना पड़े.
गांव के युवाओं के लिए क्यों है यह एक बेहतर अवसर?
फिश फार्मिंग ऐसा व्यवसाय है जिसे कम जमीन और सीमित संसाधनों के साथ शुरू किया जा सकता है. गांव के युवाओं को इसमें स्थानीय स्तर पर ही रोजगार मिल सकता है, जिससे उन्हें रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ेगा. इसके अलावा यह काम पूरे साल चल सकता है, जिससे आय के नियमित स्रोत बनते हैं.
अमृत सरोवर योजना के माध्यम से तैयार हो रहे तालाब गांवों में एक स्थायी संपत्ति के रूप में काम करेंगे. सिंचाई, पशुपालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और किसानों की आमदनी के नए रास्ते खुलेंगे.