षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति एक साथ, कैसे करेंगे चावलों का व्रत?

    Makar Sakranti, Shatshila Ekadashi: इस साल मकर संक्रांति को लेकर लोगों के मन में खास उलझन है. वजह है 14 जनवरी 2026 का दुर्लभ संयोग, जब मकर संक्रांति के दिन ही षटतिला एकादशी भी पड़ रही है.

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    Makar Sakranti, Shatshila Ekadashi: इस साल मकर संक्रांति को लेकर लोगों के मन में खास उलझन है. वजह है 14 जनवरी 2026 का दुर्लभ संयोग, जब मकर संक्रांति के दिन ही षटतिला एकादशी भी पड़ रही है. एक ओर संक्रांति का पर्व, जिसमें खिचड़ी, तिल और गुड़ का विशेष महत्व है, तो दूसरी ओर एकादशी, जिस दिन शास्त्रों में चावल का सेवन वर्जित माना गया है. ऐसे में श्रद्धालु यही सोच रहे हैं कि आखिर इस दिन खिचड़ी खाई जाए या नहीं. आइए, शास्त्रीय मान्यताओं और पंचांग के आधार पर इस भ्रम को दूर करते हैं.


    ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ऐसा संयोग बहुत कम देखने को मिलता है. इससे पहले वर्ष 2003 में एकादशी और मकर संक्रांति एक ही दिन पड़ी थीं और अब करीब 23 साल बाद फिर ऐसा योग बना है. जब भी दो प्रमुख तिथियां एक साथ आती हैं, तो निर्णय पंचांग में दी गई तिथि की समाप्ति के समय के आधार पर किया जाता है. पंचांग के मुताबिक माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को शाम 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी. इसके बाद एकादशी समाप्त हो जाएगी. ऐसे में सूर्यास्त के बाद चावल से बनी खिचड़ी का सेवन और दान करना शास्त्रसम्मत माना गया है और इससे किसी तरह का दोष नहीं लगता.

    त्योहारों में नियमों की होती है छूट

    कई विद्वानों का यह भी मत है कि सनातन परंपरा में पर्व और उत्सव सामान्य व्रत नियमों से ऊपर माने जाते हैं. त्योहारों का उद्देश्य सामाजिक और आध्यात्मिक आनंद होता है, इसलिए इन दिनों कठोर नियमों की बाध्यता नहीं होती. इसी कारण मकर संक्रांति जैसे पर्व पर श्रद्धा और परंपरा के अनुसार खिचड़ी का सेवन किया जा सकता है, भले ही उस दिन एकादशी क्यों न हो.

    मकर संक्रांति पर क्या-क्या किया जाता है?

    मकर संक्रांति के दिन सुबह स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देने की परंपरा है. इसके बाद तिल, गुड़, चावल और काली उड़द का दान किया जाता है. खिचड़ी का भोग लगाकर उसका सेवन करना इस पर्व की विशेष पहचान है. उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में दही-चूड़ा खाने की भी परंपरा है, जिसे शुभ माना जाता है.

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