इस्लामाबाद: पाकिस्तान में सेना केवल एक रक्षात्मक संस्था नहीं रही, बल्कि अब यह देश के सत्ता, संसाधनों और संपत्तियों पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुकी है. लोकतांत्रिक संस्थाओं से लेकर आर्थिक संसाधनों तक, पाकिस्तान की सेना का नियंत्रण इतना व्यापक हो चुका है कि उसके भीतर पल रहा भ्रष्टाचार अब खुलकर सामने आने लगा है. हथियारों की खरीद से लेकर जमीन की दलाली तक, सैन्य तंत्र के भीतर कमीशनखोरी और मुनाफाखोरी का जाल बिछ चुका है.
बंद कमरों में होते हैं अरबों डॉलर के सौदे
पाकिस्तानी सेना द्वारा की जा रही हथियारों की खरीदारी की प्रक्रिया में पारदर्शिता लगभग न के बराबर है. जहाज, मिसाइलें, टॉरपीडो, विमान और पनडुब्बियों जैसी रक्षा सामग्रियों की खरीददारी के सौदे कुछ खास कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए तय किए जाते हैं. ये सौदे ऐसे बिचौलियों के जरिए करवाए जाते हैं जो सेना के शीर्ष अधिकारियों से जुड़े होते हैं और विदेशी कंपनियों से करोड़ों डॉलर के कमीशन वसूलते हैं.
पाकिस्तान के पास मौजूद पनडुब्बी बेड़े का हालिया विस्तार इस पूरे भ्रष्टाचार की गवाही देता है. चीन के साथ 2015 में हुई 4 से 5 अरब डॉलर की डील में हैंगर-श्रेणी की पनडुब्बियों की खरीद हुई. यह पाकिस्तान की अब तक की सबसे बड़ी नौसैनिक परियोजनाओं में से एक है. इस डील के वित्तीय और रणनीतिक पहलुओं को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, जिससे संदेह और सवाल और गहरे हो जाते हैं.
कराची अगोस्टा कांड से उठी भ्रष्टाचार की परत
1990 के दशक के मध्य में कराची में सामने आए अगोस्टा पनडुब्बी कांड ने पहली बार इस छिपे हुए नेटवर्क को उजागर किया था. इस मामले में फ्रांस के साथ पनडुब्बियों की डील के दौरान भारी रिश्वतखोरी के आरोप लगे थे. कई उच्च सैन्य अधिकारी और बिचौलिए जांच के घेरे में आए. लेकिन इस घोटाले के बावजूद यह भ्रष्ट प्रणाली न केवल बची रही, बल्कि और मजबूत होती गई.
रियल एस्टेट में सेना का कब्जा
पाकिस्तान की सेना केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है. अब उसने रियल एस्टेट के क्षेत्र में भी व्यापक दखल बना लिया है. रक्षा आवास प्राधिकरण (DHA) और नौसेना की बहरिया फाउंडेशन जैसी संस्थाओं ने सेना को देश के सबसे बड़े रियल एस्टेट डेवलपर्स में से एक बना दिया है. ये संस्थाएं देश के कई बड़े शहरों में महंगे रिहायशी और वाणिज्यिक प्रोजेक्ट्स चलाती हैं, जिनसे होने वाला मुनाफा केवल गिने-चुने लोगों की जेबों में जाता है.
DHA को विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त है, जिससे यह सरकारी जांच एजेंसियों की निगरानी से बाहर रहता है. एक राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (NAB) की जांच में सामने आया कि DHA के कई वरिष्ठ अधिकारी करोड़ों डॉलर की फर्जी परियोजनाओं में शामिल पाए गए, लेकिन जांच को बाद में ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.
बहरिया फाउंडेशन: सेना की व्यावसायिक शाखा
बहरिया फाउंडेशन को 1982 में पाकिस्तानी नौसेना ने स्थापित किया था. वर्तमान में यह संगठन ड्रेजिंग, समुद्री सहायता, सूचना प्रौद्योगिकी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में कई व्यावसायिक उपक्रम चला रहा है. यह सेना की व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं का हिस्सा है, जिससे वे सीधे आम नागरिकों की अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करते हैं और भारी मुनाफा कमाते हैं.
पाकिस्तानी सेना में हो रहे इन घोटालों से सामान्य सैनिकों को दूर रखा जाता है. ये सौदे केवल उच्च रैंक के अधिकारी और उनके विश्वसनीय कारोबारी मित्रों द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं. निचले स्तर पर तैनात सैनिकों को इन सौदों की जानकारी तक नहीं दी जाती. वे सिर्फ आदेशों का पालन करते हैं, जबकि मुनाफा सेना के शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों की जेब में चला जाता है.
सेना पर लगाम लगाने की कोशिश नाकाम
जब भी इन सौदों और घोटालों की जांच की बात आती है, उसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर दबा दिया जाता है. जांच की फाइलें गोपनीय करार दी जाती हैं और न्यायिक प्रक्रिया को पंगु बना दिया जाता है. पाकिस्तान के भीतर सेना की राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत है कि कोई भी राजनीतिक दल या संस्था खुलकर सेना के खिलाफ जांच नहीं चला सकती.
आर्थिक संकट के बीच सेना का खर्चा
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर संकट से गुजर रही है. आईएमएफ से लिए गए राहत पैकेज और सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी में कटौती के कारण आम नागरिकों की हालत बदतर होती जा रही है. महंगाई आसमान छू रही है, रोजगार के अवसर घट रहे हैं और मुद्रा की कीमत गिर रही है. इसके बावजूद सेना के बजट में कटौती नहीं की गई है, बल्कि उसमें बढ़ोतरी देखी जा रही है. बड़े रक्षा सौदे और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स इस संकट के बीच भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.
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