संसद के बजट सत्र का सातवां दिन हंगामे और असाधारण घटनाक्रम का गवाह बना. लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी बात यह रही कि लगभग 22 वर्षों के बाद ऐसा हुआ जब प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में कोई भाषण नहीं दिया. आम तौर पर इस चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री का वक्तव्य एक परंपरा मानी जाती है, लेकिन इस बार सुरक्षा कारणों के चलते यह परंपरा टूट गई.
लोकसभा सचिवालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण न देने के पीछे गंभीर सुरक्षा इनपुट सामने आए थे. जानकारी यह दी गई कि सदन के भीतर प्रधानमंत्री पर शारीरिक हमले की साजिश की आशंका जताई गई थी. इसी कारण से एहतियातन उनके लोकसभा में बोलने का कार्यक्रम टाल दिया गया.
सुरक्षा एजेंसियों के इनपुट के बाद लिया गया फैसला
सूत्रों के अनुसार, बजट सत्र के दौरान विपक्षी दलों की ओर से लगातार हंगामे और नारेबाजी हो रही थी. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के वक्त भी माहौल तनावपूर्ण बना हुआ था. इसी बीच सुरक्षा एजेंसियों और लोकसभा सचिवालय को कुछ ऐसे इनपुट मिले, जिनमें प्रधानमंत्री की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई थी.
बताया गया कि सदन के भीतर अव्यवस्था के बीच किसी तरह की अप्रिय स्थिति पैदा हो सकती थी. इसी आशंका के चलते लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कार्यवाही को आगे न बढ़ाते हुए स्थिति को संभालने का फैसला लिया गया. प्रधानमंत्री सदन में मौजूद थे और बोलने के लिए तैयार भी थे, लेकिन सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए यह निर्णय लिया गया कि उस वक्त उनका वक्तव्य न कराया जाए.
‘महिला सांसदों को आगे करने’ की बात का जिक्र
लोकसभा सचिवालय से जुड़े सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया कि विपक्ष की ओर से रणनीतिक तौर पर महिला सांसदों को आगे रखकर सदन में घेराव जैसी स्थिति बनाने की योजना की जानकारी मिली थी. इसे सुरक्षा एजेंसियों ने संभावित खतरे के तौर पर देखा. इसी वजह से सुरक्षात्मक दृष्टि से स्थिति को टालने का निर्णय लिया गया.
हालांकि, इस पूरे मामले को लेकर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान नहीं दिया गया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सदन की गरिमा और प्रधानमंत्री की सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया गया.
कांग्रेस नेताओं से बातचीत की कोशिशें
सूत्रों के मुताबिक, लोकसभा सचिवालय और सदन संचालन से जुड़े अधिकारियों ने स्थिति को सामान्य बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से कई बार बातचीत की. उन्हें समझाने की कोशिश की गई कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव जैसी संवैधानिक प्रक्रिया के दौरान सदन की कार्यवाही बाधित न की जाए.
बताया जा रहा है कि अधिकारियों ने बैठक और अनौपचारिक चर्चाओं के माध्यम से यह आग्रह किया था कि प्रधानमंत्री को बोलने दिया जाए और चर्चा लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़े. हालांकि, विपक्ष की ओर से लगातार विरोध और हंगामे के संकेत मिलने के कारण स्थिति सहज नहीं हो सकी.
22 साल बाद टूटी परंपरा
संसदीय इतिहास में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री का वक्तव्य एक अहम परंपरा रही है. करीब 22 वर्षों बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब यह प्रक्रिया प्रधानमंत्री के भाषण के बिना पूरी हुई. राजनीतिक हलकों में इसे असाधारण घटनाक्रम माना जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटनाक्रम संसद के भीतर बढ़ते तनाव और टकराव की राजनीति को दर्शाता है. साथ ही यह भी साफ करता है कि मौजूदा माहौल में सुरक्षा को लेकर प्रशासन और सरकार कितनी सतर्कता बरत रही है.
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