America China Trade War: बीजिंग और वाशिंगटन के बीच बढ़ते व्यापारिक तनावों के बीच एक नई घोषणा ने वैश्विक समुद्री व्यापार में हलचल मचा दी है. चीन ने अमेरिकी जहाजों पर विशेष पोर्ट फीस लगाने की घोषणा की है, जो 14 अक्टूबर 2025 से लागू होगी. यह कदम अमेरिका द्वारा चीनी जहाजों पर लगाए गए शुल्क के जवाब में उठाया गया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा एक नई दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है.
चीन के परिवहन मंत्रालय के अनुसार, सभी अमेरिकी स्वामित्व या संचालन वाले जहाजों को हर बार चीनी बंदरगाहों पर रुकने के लिए अतिरिक्त शुल्क देना होगा. यह नियम उन जहाजों पर भी लागू होगा जिन पर अमेरिकी झंडा लगा है या जो अमेरिका में बनाए गए हैं. शुरूआत में प्रति टन शुल्क 400 युआन यानी लगभग 56.13 अमेरिकी डॉलर तय किया गया है, लेकिन इसे हर साल बढ़ाने की योजना बनाई गई है.
17 अप्रैल 2026 से यह शुल्क 640 युआन, फिर 2027 में 880 युआन और अंततः 2028 में 1,120 युआन प्रति टन तक पहुंच जाएगा. इसका मतलब है कि जितना बड़ा जहाज, उतनी अधिक फीस, और यह शुल्क हर बार लागू होगा जब कोई अमेरिकी जहाज चीन के बंदरगाह पर रुकेगा.
घरेलू जहाज निर्माण को बढ़ावा देने की कोशिश
इससे पहले अमेरिका ने भी लगभग इसी तरह की घोषणा की थी, जिसके तहत 14 अक्टूबर 2025 से चीन में बने या चीनी स्वामित्व/संचालन वाले जहाजों पर अमेरिकी बंदरगाहों में प्रवेश के समय शुल्क वसूला जाएगा. अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह फैसला यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) द्वारा किए गए सर्वेक्षण और जांच के आधार पर लिया गया है, जिसमें सुझाव दिया गया था कि चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति और वैश्विक जहाज निर्माण में उसका प्रभुत्व अमेरिकी राष्ट्रीय हितों के लिए खतरा है.
इस योजना के तहत, जब भी कोई चीनी जहाज अमेरिकी पोर्ट पर पहुंचेगा, उसे 80 डॉलर प्रति टन शुल्क देना होगा. विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि एक जहाज 10,000 कंटेनर तक का माल ले जा रहा है, तो यह शुल्क एक बार में 1 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है. इसके साथ-साथ, भविष्य में यह शुल्क और अधिक बढ़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.
वैश्विक व्यापार पर असर और दोनों पक्षों की स्थिति
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस शुल्क युद्ध में आखिर ज्यादा नुकसान किसका होगा, चीन का या अमेरिका का? उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि चीन इस क्षेत्र में अमेरिका से कहीं आगे है. वर्ष 2024 में चीन ने 1,000 से अधिक कमर्शियल जहाजों का निर्माण किया, जबकि अमेरिका की ओर से बनाए गए जहाजों की संख्या 10 से भी कम थी. इसका मतलब यह है कि चीनी जहाज अमेरिका में बार-बार रुकते हैं और उन पर लगाया गया शुल्क चीन की जहाज निर्माण और निर्यात प्रणाली पर सीधा असर डाल सकता है.
दूसरी ओर, अमेरिका के बहुत कम जहाज चीन के बंदरगाहों पर नियमित रूप से आते हैं. यही कारण है कि चीन द्वारा अमेरिकी जहाजों पर लगाए गए शुल्क से अमेरिका को नुकसान तो होगा, लेकिन वह अपेक्षाकृत सीमित रहेगा. फिर भी यह एक प्रतीकात्मक और कूटनीतिक जवाब है, जिससे यह संकेत मिलता है कि चीन अमेरिका के किसी भी आर्थिक दबाव का जवाब देने के लिए तैयार है.
समुद्री शक्ति और सुरक्षा का खेल
चीन ने पिछले दो दशकों में खुद को वैश्विक जहाज निर्माण उद्योग में अग्रणी बना लिया है. उसके सबसे बड़े शिपयार्ड न केवल व्यावसायिक जहाज बनाते हैं, बल्कि नौसैनिक जहाजों के निर्माण में भी अग्रणी हैं. अमेरिका का यह डर कि चीन की नौसैनिक शक्ति समुद्री वर्चस्व को चुनौती दे सकती है, इस तरह के आर्थिक कदमों को जन्म दे रहा है. यही वजह है कि अमेरिका अपने घरेलू जहाज निर्माण उद्योग को फिर से सक्रिय करने के लिए नीति-निर्माण कर रहा है, ताकि विदेशी निर्भरता को कम किया जा सके.
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