फ्रांस और अमेरिका से तकनीक चुराकर इजरायल ने बनाया परमाणु बम? जानिए क्या है सच्चाई

क्या आपने कभी सोचा है कि खुद इज़राइल परमाणु शक्ति कैसे बना—वो भी दुनिया की आंखों से छिपाकर?

Israel made nuclear bomb by stealing technology from France and America
प्रतीकात्मक तस्वीर | Photo: Freepik

मध्य पूर्व में परमाणु हथियार किसी भी देश के पास हों, इज़राइल उसे सीधे अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है. यही वजह है कि जब भी किसी पड़ोसी देश ने परमाणु शक्ति बनने की कोशिश की, इज़राइल ने समय रहते उसे खत्म कर दिया. इराक और सीरिया के परमाणु ठिकानों पर हुए सटीक हमले और ईरान के खिलाफ साइबर व हवाई ऑपरेशन इस रणनीति का प्रमाण हैं.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि खुद इज़राइल परमाणु शक्ति कैसे बना—वो भी दुनिया की आंखों से छिपाकर?

बेगिन सिद्धांत: हमले से पहले का एलान

1981 में इज़राइल ने इराक के ओसिरक रिएक्टर पर हमला किया. उस वक्त के प्रधानमंत्री मेनाकेम बेगिन ने स्पष्ट कर दिया था—मध्य पूर्व में कोई भी दुश्मन देश अगर परमाणु हथियार हासिल करेगा, तो इज़राइल सैन्य कार्रवाई करेगा. इसे ही 'बेगिन सिद्धांत' कहा गया. इस नीति के तहत 2007 में सीरिया के रिएक्टर को भी नेस्तनाबूद किया गया और अब यही रवैया ईरान के खिलाफ दिख रहा है—जहां साइबर हमलों से लेकर ड्रोन हमलों तक सब शामिल हैं.

डेविड बेन-गुरियन और परमाणु हथियार की जिद

इज़राइल की परमाणु यात्रा की शुरुआत 1948 में ही हो गई थी, जब देश का जन्म हुआ था. पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन मानते थे कि यहूदी राज्य को जिंदा रहने के लिए परमाणु हथियार चाहिए. उनके मुताबिक, यह आने वाले किसी भी नरसंहार से बचने की गारंटी थी.

उन्होंने कहा था कि जैसे आइंस्टीन, ओपेनहाइमर और टेलर—तीनों यहूदी वैज्ञानिक—अमेरिका के लिए बम बना सकते हैं, वैसे ही इज़राइल के वैज्ञानिक भी अपने देश के लिए कर सकते हैं.

वैज्ञानिक, जासूसी और गुप्त गठबंधन

1952 में इज़राइल ने अपना परमाणु आयोग बनाया. हालांकि उस वक्त उनके पास न तकनीक थी, न यूरेनियम. ऐसे में नजरें अंतरराष्ट्रीय सहयोग और गुप्त ऑपरेशनों पर टिक गईं. इस दिशा में सबसे निर्णायक मोड़ आया 1957 में, जब फ्रांस ने डिमोना रिएक्टर के निर्माण में मदद करने के लिए इज़राइल से समझौता किया.

यह समझौता इतना गोपनीय था कि इसे अमेरिका से भी छुपाकर रखा गया. उस समय फ्रांस को इज़राइल से स्वेज संकट में सैन्य मदद मिली थी, साथ ही अफ्रीकी उपनिवेशों की सुरक्षा के लिए इज़राइल की खुफिया जानकारी बेहद अहम थी. बदले में फ्रांस ने रिएक्टर डिज़ाइन, तकनीकी विशेषज्ञता और यहां तक कि प्लूटोनियम पुनर्संसाधन तकनीक भी मुहैया कराई.

जब सहयोग बंद हुआ, शुरू हुई जासूसी

1958 में चार्ल्स डी गॉल के फ्रांस का राष्ट्रपति बनने के बाद परमाणु सहयोग को बंद करने का आदेश दिया गया. इसके बाद इज़राइल ने अपने नेटवर्क को सक्रिय किया—यूरोप और अमेरिका में फैले यहूदी वैज्ञानिकों की मदद से क्लासिफाइड जानकारी जुटाई जाने लगी.

एक मशहूर उदाहरण है NUMEC स्कैंडल. 1960 के दशक में अमेरिका के पेंसिल्वेनिया स्थित एक परमाणु प्लांट से अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम रहस्यमय तरीके से गायब हो गया. बाद में यह शक गहराया कि यह सामग्री इज़राइल भेजी गई थी. अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने उस समय इशारा किया था कि इज़राइल ने अवैध रूप से यह सामग्री प्राप्त की थी.

नकली कंपनियों की मदद से सामग्रियों की खरीद

इज़राइल ने कई मुखौटा कंपनियां स्थापित कीं जो नागरिक उद्योगों के नाम पर संवेदनशील सामग्री यूरोप और अमेरिका से खरीदती थीं. इन सामग्रियों को फिर डिमोना भेजा जाता, जहां उन्हें सैन्य उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाता. इसका उद्देश्य था निर्यात नियंत्रण और अंतरराष्ट्रीय जांच से बचना.

हथियार हैं, लेकिन कोई स्वीकृति नहीं

आज भी इज़राइल ने कभी आधिकारिक तौर पर नहीं स्वीकारा कि उसके पास परमाणु हथियार हैं. लेकिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों और शोध संस्थानों का मानना है कि उसके पास करीब 90 परमाणु बम हैं. इतना ही नहीं, इज़राइल अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का भी हिस्सा नहीं है.

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