Middle-East War: तेल-गैस से लेकर खाद तक... अगर लंबा चला ईरान जंग तो भारत में किन चीजों की होगी किल्लत?

मध्य पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह गया है. इसका असर धीरे-धीरे भारत की कृषि व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर भी दिखने लगा है.

If Iran war continues for a long time then what will be in shortage in India
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Iran War Impact: मध्य पूर्व में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी तनाव अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रह गया है. इसका असर धीरे-धीरे भारत की कृषि व्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर भी दिखने लगा है. समुद्री शिपिंग मार्गों में बाधा और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के कारण कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है. ऐसे हालात में आशंका जताई जा रही है कि यदि यह संघर्ष लंबा चलता है, तो भारत को खाद की कमी, कृषि उत्पादन में गिरावट और कीमतों में बढ़ोतरी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ताओं में शामिल है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है. यूरिया जैसे नाइट्रोजन आधारित उर्वरक धान और गेहूं जैसी प्रमुख फसलों के लिए बेहद जरूरी होते हैं. देश में हर साल लगभग 4 करोड़ टन यूरिया का इस्तेमाल होता है, जिस पर सरकार भारी सब्सिडी भी देती है.

फिलहाल उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के पास करीब 62 लाख टन यूरिया का भंडार मौजूद है, जो सामान्य परिस्थितियों में बुवाई सीजन के लिए पर्याप्त माना जाता है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति में बाधा लंबे समय तक बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में स्थिति गंभीर हो सकती है.

गैस संकट से उत्पादन पर असर

यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है. भारत अपनी गैस जरूरतों का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. मौजूदा युद्ध के कारण गैस सप्लाई प्रभावित हो रही है, जिससे उर्वरक उद्योग पर सीधा असर पड़ा है.

रिपोर्ट्स के अनुसार, कई फर्टिलाइजर कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता घटानी पड़ी है, क्योंकि उन्हें जरूरत के मुकाबले केवल लगभग 70 प्रतिशत गैस ही मिल पा रही है. इसका सीधा असर उर्वरक उत्पादन और बाजार में उपलब्धता पर पड़ रहा है.

किसानों पर संभावित प्रभाव

फिलहाल पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में किसानों को ज्यादा दबाव महसूस नहीं हो रहा है, क्योंकि वहां किसान आमतौर पर मई के आसपास खाद की खरीद शुरू करते हैं. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आपूर्ति की समस्या जारी रहती है, तो खरीफ सीजन के दौरान स्थिति बिगड़ सकती है.

जिन क्षेत्रों में पहले से अधिक मात्रा में उर्वरक का उपयोग होता है, वहां असर सीमित रह सकता है. लेकिन जिन इलाकों में उर्वरकों का उपयोग कम होता है, वहां उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है और पैदावार घटने की संभावना बढ़ सकती है.

किन चीजों की हो सकती है किल्लत?

अगर अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत को कई जरूरी चीजों की कमी का सामना करना पड़ सकता है. इनमें प्रमुख रूप से कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और उर्वरक शामिल हैं.

खाद की कमी या महंगाई का सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा. यदि यूरिया और अन्य उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होती है, तो गेहूं, धान और मक्का जैसी मुख्य फसलों की पैदावार में गिरावट आ सकती है. उत्पादन घटने का मतलब है बाजार में अनाज की उपलब्धता कम होना और कीमतों में तेजी आना.

खाद्य महंगाई का व्यापक असर

अनाज की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं रहेगा. इसका प्रभाव डेयरी और पोल्ट्री सेक्टर पर भी पड़ेगा. पशुओं के चारे की लागत बढ़ने से दूध, अंडे और चिकन जैसी चीजें भी महंगी हो सकती हैं.

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