पश्चिम एशिया और कॉकस क्षेत्र में हालात एक बार फिर तनावपूर्ण होते जा रहे हैं. ईरान, जो हाल ही में इज़राइल और अमेरिका के साथ संघर्ष के चलते सुर्खियों में था, अब अपने उत्तरी पड़ोसी अजरबैजान के एक रणनीतिक प्रोजेक्ट को लेकर सख्त तेवर अपनाए हुए है. यह विवाद है ज़ंगेज़ुर कॉरिडोर को लेकर, जिसे अजरबैजान और तुर्की मिलकर आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन ईरान इसे अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रभाव के लिए गंभीर खतरा मान रहा है.
अजरबैजान का उद्देश्य ज़ंगेज़ुर कॉरिडोर के ज़रिए अपनी मुख्य भूमि को नखचिवान एक्सक्लेव से जोड़ना है, जो कि फिलहाल ईरान के रास्ते से जुड़ा हुआ है. यह प्रस्तावित मार्ग आर्मेनिया के स्यूनिक प्रांत से होकर निकलेगा, जिससे अजरबैजान को ईरान को बाईपास करने का सीधा फायदा मिलेगा. इससे न केवल ईरान का भू-रणनीतिक महत्व घटेगा, बल्कि आर्मेनिया की संप्रभुता और ईरान-आर्मेनिया सीमाओं में बदलाव की भी संभावना बढ़ जाएगी.
इतिहास और हालिया घटनाक्रम
इस परियोजना को 2020 के नागोर्नो-काराबाख युद्ध में अजरबैजान की जीत के बाद बल मिला. हालांकि युद्धविराम समझौते में नए परिवहन रूट्स का उल्लेख था, लेकिन इसमें अजरबैजान को आर्मेनियाई भूभाग पर संप्रभु नियंत्रण नहीं दिया गया था. जब 2023 और 2024 के बीच अजरबैजान और तुर्की ने इस कॉरिडोर को अमल में लाने की कोशिश की, तो ईरान ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. ईरानी सेना ने आर्मेनिया की सीमा पर तैनाती कर दी और इस परियोजना को आगे बढ़ने से रोक दिया.
अमेरिका की एंट्री और नया समीकरण
हाल ही में इस मुद्दे में अमेरिका की भागीदारी की संभावना भी सामने आई है. तुर्की में अमेरिकी राजदूत द्वारा इस कॉरिडोर के निर्माण और संचालन में वाशिंगटन की भूमिका का सुझाव दिए जाने के बाद स्थिति और जटिल हो गई है. विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की इस संभावित भूमिका ने अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव को समझौतों को खारिज करने का नया साहस दे दिया है.
ज़ंगेज़ुर कॉरिडोर: ईरान के लिए क्यों है खतरा?
ईरान इस कॉरिडोर को सिर्फ एक मार्ग न मानकर भू-राजनीतिक चाल के रूप में देख रहा है. उसका मानना है कि इससे रूस और ईरान को अलग-थलग किया जा सकता है, अलगाववाद को बढ़ावा मिल सकता है और ईरानी सीमाओं की भू-राजनीतिक घेराबंदी की जा सकती है. इस खतरे को भांपते हुए ईरान ने सख्त रणनीति अपनाई है. सीमावर्ती क्षेत्रों में सेना की तैनाती बढ़ाई गई है, और हर गतिविधि पर सतर्क निगरानी रखी जा रही है. तेहरान ने साफ संकेत दे दिया है कि अगर यह परियोजना जबरन लागू करने की कोशिश की गई, तो वह सैन्य कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा.
कॉकस में नए संघर्ष की आहट?
ईरान, अजरबैजान, तुर्की और अमेरिका के इस त्रिकोणीय तनाव ने कॉकस क्षेत्र को एक बार फिर सैन्य संघर्ष की ओर धकेल दिया है. जहां एक ओर बाकू इस कॉरिडोर को क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और विकास का जरिया मानता है, वहीं ईरान इसे राष्ट्रीय अस्मिता और सुरक्षा पर हमला समझता है. आने वाले समय में अगर कोई समझौता नहीं होता, तो यह टकराव और गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.
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