ग्वादर से क्वेटा तक विद्रोह की आग, हमलों से मुनीर की सेना परेशान, पाकिस्तान से अलग होगा बलूचिस्तान?

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में एक बार फिर सुरक्षा हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. बलूच विद्रोही संगठन पाकिस्तानी सेना और पुलिस को लगातार निशाना बना रहे हैं.

insurgency from Gwadar to Quetta will Balochistan break away from Pakistan
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

क्वेटा: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में एक बार फिर सुरक्षा हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. बलूच विद्रोही संगठन पाकिस्तानी सेना और पुलिस को लगातार निशाना बना रहे हैं. अलग-अलग इलाकों में हो रहे हमलों ने पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है.

बलूच विद्रोही संगठन लंबे समय से पाकिस्तान से अलग बलूचिस्तान की मांग कर रहे हैं. उनका दावा है कि उन्होंने कई इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है. कुछ संगठनों ने अलग प्रशासन, झंडे और संविधान की बात भी कही है. हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है.

बलूचिस्तान की स्थिति को लेकर चीन की चिंता भी बढ़ सकती है, क्योंकि इसी इलाके से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी सीपीईसी गुजरता है. ग्वादर बंदरगाह भी इसी प्रांत में है और चीन ने यहां बड़े स्तर पर निवेश किया है.

पाकिस्तानी सेना पर लगातार हमले

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट और दूसरे बलूच संगठनों की ओर से पाकिस्तानी सुरक्षाबलों पर हमलों की खबरें आती रही हैं. इन संगठनों ने कई इलाकों में सेना के काफिलों, चौकियों और ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है.

विद्रोही संगठनों की रणनीति में घात लगाकर हमला करना और सुरक्षा बलों के ठिकानों पर अचानक हमला करना शामिल है. कुछ मामलों में आत्मघाती हमलों का भी इस्तेमाल किया गया है.

इन हमलों के कारण पाकिस्तान सरकार के लिए बलूचिस्तान के कई इलाकों में सुरक्षा बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है.

ग्वादर और खनन परियोजनाएं भी निशाने पर

बलूच विद्रोहियों की नजर सिर्फ सेना और पुलिस पर ही नहीं है. ग्वादर के आसपास के इलाकों के अलावा खनन और दूसरी बड़ी परियोजनाएं भी उनके निशाने पर रही हैं.

रेको डिक जैसे बड़े खनिज प्रोजेक्ट को लेकर भी सुरक्षा चिंता बढ़ी है. बलूचिस्तान में तांबा, सोना, कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं. इन संसाधनों को लेकर पाकिस्तान और चीन दोनों की बड़ी दिलचस्पी है.

विद्रोही संगठन इन परियोजनाओं को बलूचिस्तान के संसाधनों के इस्तेमाल से जोड़कर विरोध करते रहे हैं.

क्वेटा-ताफ्तान मार्ग को लेकर भी तनाव

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी की ओर से क्वेटा-ताफ्तान मार्ग पर आर्थिक दबाव बनाने का दावा किया गया है. इस रास्ते से सामान और वाहनों की आवाजाही होती है.

अगर किसी बड़े मार्ग पर लंबे समय तक आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर कारोबार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. खनन और व्यापार से जुड़े काम भी प्रभावित हो सकते हैं.

क्या 85 फीसदी इलाके पर विद्रोहियों का कब्जा है?

बलूच संगठनों की ओर से अलग-अलग इलाकों में अपनी बढ़ती पकड़ के दावे किए जा रहे हैं. बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट ने खुजदार, तुर्बत और दलबंदीन समेत कई जगहों पर पाकिस्तानी सुरक्षाबलों के खिलाफ हमलों का दावा किया है.

संगठन ने बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने की बात भी कही है. कुछ दावों में बलूचिस्तान के करीब 85 फीसदी हिस्से पर पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण नहीं होने की बात कही गई है.

हालांकि, इन आंकड़ों और इलाके पर नियंत्रण से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए इन्हें विद्रोही संगठनों के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

CPEC पर भी बढ़ सकता है दबाव

बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा का असर चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे पर पड़ सकता है. सीपीईसी के तहत कई बड़ी परियोजनाएं बलूचिस्तान में चल रही हैं और ग्वादर बंदरगाह इसका अहम हिस्सा है.

सीपीईसी पाकिस्तान को चीन के शिनजियांग क्षेत्र से जोड़ने वाली बड़ी आर्थिक परियोजना है. चीन ने इसके तहत पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश किया है.

अगर बलूचिस्तान में सुरक्षा हालात लंबे समय तक खराब रहते हैं तो निर्माण कार्य, सामान की आवाजाही और निवेश पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा पाकिस्तान के साथ-साथ चीन के लिए भी बड़ी चिंता बन सकती है.

पाकिस्तान के सामने बड़ी चुनौती

बलूचिस्तान में विद्रोही संगठनों की गतिविधियां पाकिस्तान के लिए लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं. अब अगर हमले और ज्यादा इलाकों में फैलते हैं तो सरकार के सामने सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि पाकिस्तान सरकार इस बढ़ती हिंसा को कैसे रोकती है और बलूचिस्तान में अपनी पकड़ कितनी मजबूत कर पाती है. दूसरी ओर, चीन के लिए भी अपने निवेश और सीपीईसी परियोजनाओं की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है.

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