Orange Economy: बजट 2026 के भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जिस सेक्टर पर खास तौर पर रोशनी डाली, वह अब तक भारत में आर्थिक बहस के केंद्र में कम ही रहा है. यह सेक्टर है “ऑरेंज इकोनॉमी”, यानी रचनात्मक और सांस्कृतिक उद्योगों से जुड़ी अर्थव्यवस्था.
सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में एनीमेशन, गेमिंग, डिजाइन, डिजिटल कंटेंट, फिल्म, संगीत और सांस्कृतिक पर्यटन जैसे क्षेत्र न सिर्फ बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करेंगे, बल्कि निर्यात और ग्लोबल ब्रांडिंग के नए मौके भी खोलेंगे. बजट में इस सेक्टर को जगह मिलना इस बात का संकेत है कि सरकार अब विकास के नए इंजनों की तलाश में पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़कर क्रिएटिव इकॉनमी की ओर देख रही है.
ऑरेंज इकोनॉमी क्या होती है?
ऑरेंज इकोनॉमी उन सभी उद्योगों और सेवाओं को कहा जाता है, जिनका आधार रचनात्मकता, कला, संस्कृति और बौद्धिक संपदा होती है. इसमें फिल्म और टीवी प्रोडक्शन, म्यूजिक इंडस्ट्री, एनीमेशन और वीएफएक्स, गेमिंग, डिजिटल कंटेंट क्रिएशन, फैशन और डिजाइन, थिएटर, विजुअल आर्ट, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक आयोजन और पर्यटन से जुड़े कई क्षेत्र शामिल हैं. इस अवधारणा को पहली बार 2013 में लैटिन अमेरिका, खासकर कोलंबिया के नीति-निर्माताओं ने लोकप्रिय बनाया था. उनका तर्क था कि जब विचारों और रचनात्मक प्रतिभा को आर्थिक मूल्य में बदला जाता है और उस मूल्य की नींव बौद्धिक संपदा पर होती है, तो वही असल में ऑरेंज इकोनॉमी है. संस्कृति और रचनात्मकता के प्रतीक के तौर पर “ऑरेंज” रंग को इस अर्थव्यवस्था का नाम दिया गया.
बजट 2026 में क्या-क्या ऐलान हुए
वित्त मंत्री ने अपने भाषण में खास तौर पर AVGC सेक्टर यानी Animation, Visual Effects, Gaming और Comics का उल्लेख किया. सरकार का अनुमान है कि 2030 तक इस सेक्टर में करीब 20 लाख प्रशिक्षित प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी. इसी को ध्यान में रखते हुए देशभर के हजारों स्कूलों और सैकड़ों कॉलेजों में कंटेंट क्रिएशन और AVGC से जुड़ी लैब स्थापित करने की घोषणा की गई है, ताकि छात्रों को शुरुआती स्तर से ही डिजिटल और क्रिएटिव स्किल्स का प्रशिक्षण मिल सके.
इसके अलावा डिजाइन इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए पूर्वी भारत में एक नए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया है. सांस्कृतिक पर्यटन को नई ऊंचाई देने के लिए सरकार ने कई ऐतिहासिक स्थलों को आधुनिक सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना भी बताई है, जहां डिजिटल स्टोरीटेलिंग, इंटरैक्टिव अनुभव और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए पर्यटकों को एक नया अनुभव दिया जाएगा.
भारत का क्रिएटिव सेक्टर कितना बड़ा है
आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक 2024 तक भारत का गेमिंग उद्योग करीब 23 हजार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच चुका है और एनीमेशन व वीएफएक्स सेक्टर भी तेजी से विस्तार कर रहा है. लाइव एंटरटेनमेंट, इवेंट मैनेजमेंट और सांस्कृतिक आयोजनों का बाजार लगातार बढ़ रहा है, जिसका सीधा फायदा पर्यटन और स्थानीय कारोबार को मिल रहा है. सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत की कुल क्रिएटिव इंडस्ट्री का आकार अब करीब 30 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है. इस क्षेत्र में लाखों लोग सीधे तौर पर रोजगार पा रहे हैं, जबकि इससे जुड़े सपोर्ट सेक्टर में भी बड़ी संख्या में नौकरियां पैदा हो रही हैं. बीते कुछ वर्षों में डिजिटल कंटेंट और क्रिएटिव सेवाओं के निर्यात में भी तेजी आई है, जिससे विदेशी मुद्रा आय में इजाफा हुआ है.
सरकार का फोकस क्यों बदल रहा है
अब तक विकास की मुख्यधारा में मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और आईटी सेक्टर को सबसे ज्यादा अहमियत मिलती रही है. लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और ओटीटी के विस्तार ने कंटेंट और क्रिएटिव इंडस्ट्री को एक बड़े आर्थिक क्षेत्र में बदल दिया है. गेमिंग, एनीमेशन, डिजिटल डिजाइन और कंटेंट प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम पूंजी निवेश से भी बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित किया जा सकता है. यही वजह है कि सरकार अब इस सेक्टर को केवल मनोरंजन के तौर पर नहीं, बल्कि रोजगार, निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के एक मजबूत स्तंभ के रूप में देखने लगी है.
किसे और कैसे होगा फायदा
जब किसी ऐतिहासिक स्थल या सांस्कृतिक आयोजन को बड़े पैमाने पर विकसित किया जाता है, तो उसका असर सिर्फ पर्यटन तक सीमित नहीं रहता. होटल, परिवहन, स्थानीय व्यापारी, कलाकार, हस्तशिल्प से जुड़े कारीगर और इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े हजारों लोगों को सीधा लाभ मिलता है. कई बड़े सांस्कृतिक आयोजनों के दौरान यह देखा गया है कि कुछ ही दिनों में स्थानीय अर्थव्यवस्था में करोड़ों रुपये का प्रवाह हो जाता है. सरकार इसी मॉडल को अलग-अलग राज्यों और शहरों में अपनाकर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा करना चाहती है.
चुनौतियां क्या हैं
विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ नीतिगत घोषणाओं से इस सेक्टर में तेजी नहीं आएगी. आयोजन और प्रोडक्शन गतिविधियों के लिए परमिशन और क्लीयरेंस की जटिल प्रक्रिया अब भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है. लंबे समय से सिंगल विंडो क्लियरेंस सिस्टम की मांग की जा रही है ताकि फिल्म शूटिंग, इवेंट्स और डिजिटल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी जल्दी मिल सके. इसके अलावा प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी भी एक अहम चुनौती है. नए प्रशिक्षण संस्थानों और स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम से धीरे-धीरे इस कमी को दूर किया जा सकता है.
आगे की राह कैसी दिखती है
अगर सरकार कौशल विकास, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश प्रोत्साहन पर लगातार ध्यान देती रही, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक कंटेंट और क्रिएटिव सर्विसेज बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है. एनीमेशन, गेमिंग, डिजाइन और डिजिटल कंटेंट जैसे क्षेत्र नए स्टार्टअप, रोजगार और निर्यात अवसरों के बड़े स्रोत बन सकते हैं. कुल मिलाकर, बजट 2026 में ऑरेंज इकोनॉमी पर दिया गया जोर सिर्फ एक नई शब्दावली नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक रणनीति में हो रहे उस बदलाव का संकेत है, जहां रचनात्मकता को भी विकास के प्रमुख इंजन के रूप में देखा जा रहा है.
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