Indus Water Treaty: भारत द्वारा पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गतिविधियों के बाद सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के फैसले से दोनों देशों के बीच जल विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. इसी के बाद पाकिस्तान ने नीदरलैंड के हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय में भारत के जम्मू-कश्मीर में बने जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर आपत्ति दर्ज कराई. पाकिस्तान की ओर से बगलिहार और किशनगंगा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के संचालन पर सवाल उठाए गए, जिनकी सुनवाई 2 और 3 फरवरी को प्रस्तावित की गई थी.
मध्यस्थता न्यायालय की ओर से भारत से इन परियोजनाओं से जुड़े संचालन संबंधी आंकड़े और दस्तावेज साझा करने को कहा गया. हालांकि भारत ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया. भारत सरकार ने साफ किया कि वह इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता और इसलिए किसी भी तरह की जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है.
भारत का स्पष्ट रुख: अदालत का अधिकार क्षेत्र मान्य नहीं
नई दिल्ली ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कभी इस मध्यस्थता न्यायालय को औपचारिक रूप से मान्यता नहीं दी है. भारत का कहना है कि ऐसे किसी मंच के आदेश कानूनी रूप से उस पर लागू नहीं होते. सरकार ने इन निर्देशों को अवैध और शून्य करार देते हुए कहा कि भारत अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों में बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगा.
सिंधु जल संधि स्थगित होने के बाद मध्यस्थता पर सवाल
भारत की दलील है कि जब सिंधु जल संधि फिलहाल स्थगित है, तो उससे जुड़े किसी भी मध्यस्थता तंत्र का औचित्य अपने आप समाप्त हो जाता है. ऐसे में इस तरह की अदालतों के फैसले भारत पर बाध्यकारी नहीं हो सकते. इससे पहले भी 2025 में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय की ओर से किशनगंगा और रैटल परियोजनाओं से जुड़े विवाद पर अधिकार क्षेत्र जताया गया था, जिस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी.
पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय रणनीति पर भारत की सख्त प्रतिक्रिया
भारत का मानना है कि पाकिस्तान इस तरह के मंचों के जरिए द्विपक्षीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय रंग देने की कोशिश कर रहा है. हालांकि भारत का रुख लगातार यही रहा है कि जल समझौते और उससे जुड़े विवादों का समाधान तय प्रक्रियाओं और आपसी संवाद के जरिए ही होना चाहिए, न कि ऐसे मंचों पर जिनकी वैधता भारत स्वीकार नहीं करता.
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