डायरेक्टर: श्रीराम राघवन
कास्ट: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
राइटर: श्रीराम राघवन, अरिजीत बिस्वास, पूजा लाधा सुरती
ड्यूरेशन: 143 मिनट
रेटिंग: 4.5
IKKIS X Movie Review: इक्कीस किसी पारंपरिक वॉर फिल्म की तरह तेज़ एक्शन और नारेबाज़ी पर निर्भर नहीं करती. यह फिल्म शांति और संवेदनशीलता के साथ युद्ध की सच्चाई दिखाती है और दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है कि युद्ध इंसानों से क्या ले जाता है और पीछे क्या छोड़ जाता है. श्रीराम राघवन की यह फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिन्होंने 21 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया और भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता बने.
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह युद्ध को किसी तमाशे की तरह नहीं दिखाती. इसमें राजनीति या दुश्मनी को उभारने की कोशिश नहीं है. कहानी का फोकस है इंसानी भावनाओं, बहादुरी और उस दर्द पर जो युद्ध के बाद भी साथ रहता है.
दो टाइमलाइन में चलती है फिल्म की कहानी
कहानी दो टाइमलाइन में चलती है. पहली टाइमलाइन 1971 की बसंतर की लड़ाई में ले जाती है, जहां युवा अरुण खेत्रपाल अपनी टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करते हैं. युद्ध के दृश्य सटीक और तनावपूर्ण हैं, लेकिन दिखावटी नहीं. राघवन ने युद्ध के दृश्य को एक यंग और फीयरलेस लेकिन अनुभवहीन लेफ्टिनेंट के नज़रिये से दिखाया हैं, जिसमे हमें डर, साहस और ज़िंदादिली साथ नजर आती हैं, इस फिल्म को मेकर्स ही जिम्मेदारी और संवेदनशीलता से साथ बनाया है. अगस्त्य नंदा ने अरुण के किरदार में ईमानदारी और डिग्निटी से साथ निभाया हैं. हालांकि यह उनकी डेब्यू फिल्म हैं लेकिन उनका प्रदर्शन बेहद प्रभावशाली हैं. अरुण को एक जोशीला, अनुशासित और आदर्शवादी जवान दिखाया गया है. उसकी बहादुरी भाषणों में नहीं, बल्कि उसके फैसलों में दिखाई देती है. जब उसे वॉर में पीछे हटने का आदेश मिलता है और वह अपने टैंक को छोड़ने से इंकार करता है, वह सीन दर्शकों के दिल को छू जाता है, और यही शायद वीरो की निशानी है, उन्हें मरना मंजूर हैं, लेकिन युद्ध में पीछे हटना मंजूर नहीं.
ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के किरदार में धर्मेंद्र
वही दूसरी टाइमलाइन 2001 में सेट है, जो फिल्म का इमोशनल केंद्र है. धर्मेंद्र, अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के किरदार में हैं. दशकों बाद भी वह बेटे की शहादत के दर्द के साथ जी रहे हैं. उनकी मुलाकात ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नासिर (जयदीप अहलावत) से होती है. यह हिस्सा वॉर और बैटल से ज़्यादा यादों, समझ और मानवीय रिश्तों पर केंद्रित है. धर्मेंद्र और अहलावत के बीच के दृश्य फिल्म के सबसे भावुक और प्रभावशाली पल हैं.धर्मेंद्र की अंतिम फिल्म में उनकी सादगी और गंभीरता हर दृश्य को असरदार बनाती है. उनके किरदार में पिता का दर्द, गर्व और खोए हुए बेटे की याद गहराई से दिखती है. जयदीप अहलावत का अभिनय शांत और प्रभावशाली है. सिमर भाटिया, अरुण की प्रेमिका के रूप में, कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी उपस्थिति और संवेदना दिखाने में सफल रहती हैं.
फिल्म के डायलाग सटीक और भावनात्मक
तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत है. टैंक युद्ध दृश्य और VFX वास्तविक लगते हैं. बैकग्राउंड म्यूज़िक और साउंड डिजाइन मूड को पूरी तरह साथ ले जाते हैं. फिल्म के डायलाग सटीक और भावनात्मक हैं.मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी इक्कीस सिर्फ युद्ध जीतने की कहानी नहीं है. यह उस भावनात्मक और मानवीय कीमत की कहानी है जो युद्ध इंसानों से वसूलता है. यह फिल्म आपको युद्ध के शोर से हटकर, उसकी सच्चाई और इंसानी भावनाओं को महसूस करने का मौका देती है, और लंबे समय तक आपके मन में रहती है.
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