पाकिस्तान जितना ज़ोर लगाकर दुनिया को ये दिखाना चाहता है कि उसके यहां चीनी नागरिक पूरी तरह सुरक्षित हैं, हकीकत उतनी ही उलझी और डरावनी है. इस बार खुद चीन ने अपनी नाराजगी ज़ाहिर कर दी और वो भी सीधे-सीधे पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को बीजिंग में तलब करके.
दरअसल, चीन अब इस बात से थक चुका है कि उसके नागरिक पाकिस्तान की ज़मीन पर बार-बार निशाना बनाए जा रहे हैं और इस्लामाबाद सिर्फ बयानबाज़ी करके पीछा छुड़ा लेता है. इस बार गुस्सा सिर्फ मीडिया या कूटनीतिक बयान तक सीमित नहीं रहा- चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने जनरल मुनीर से आमने-सामने बेहद तीखे शब्दों में कहा कि ये लापरवाही अब और बर्दाश्त नहीं होगी.
चीनी नागरिकों की कब्रगाह बनता पाकिस्तान
ये कोई एक-दो घटनाएं नहीं हैं. सालों से चीन के इंजीनियर, तकनीकी कर्मचारी और प्रोजेक्ट लीडर्स पाकिस्तान में हमलों का शिकार बनते आ रहे हैं. बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे असुरक्षित इलाकों में हालात इतने खराब हैं कि चीन के प्रोजेक्ट्स के लिए आने वाले कई नागरिक अब जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं.
2021 की बात करें तो दासू हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट पर हुआ आत्मघाती हमला किसी को नहीं भूलना चाहिए, जिसमें नौ चीनी इंजीनियर मारे गए थे. फिर 2023 में कराची में एक काफिले पर हुआ हमला, जिसमें फिर से चीनी नागरिकों को निशाना बनाया गया.
इन घटनाओं के पीछे जो नाम सबसे ज़्यादा सामने आया है, वो है बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA). इस संगठन के लिए CPEC कोई विकास परियोजना नहीं, बल्कि स्थानीय संसाधनों की लूट है. और यही वजह है कि वे इसे विदेशी कब्जा मानते हैं और चीनी नागरिक उनके लिए 'टारगेट' बन जाते हैं.
बीजिंग ने सीधा कह दिया: अब और नहीं
जब जनरल मुनीर बीजिंग पहुंचे तो उन्हें उम्मीद थी कि सैन्य सहयोग, रणनीतिक साझेदारी और आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता जैसे पुराने नारों से काम चल जाएगा. लेकिन वांग यी ने बहुत साफ और कड़े शब्दों में कह दिया कि अगर पाकिस्तान चीनी नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकता, तो ऐसे किसी गठजोड़ की कोई अहमियत नहीं रह जाती. चीन अब इस मामले में कूटनीतिक भाषा नहीं बोल रहा. वो अपनी आर्थिक परियोजनाओं और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर बेहद स्पष्ट और आक्रामक हो गया है.
सूत्रों की मानें तो बैठक के बाद जनरल मुनीर ने शर्मिंदगी के साथ वादा किया कि पाकिस्तान की सेना अब सुरक्षा में कोई कमी नहीं छोड़ेगी. आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशनों को तेज किया जाएगा और CPEC से जुड़े हर नागरिक और प्रोजेक्ट की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी.
लेकिन क्या भरोसा कर सकता है बीजिंग?
यहां सवाल सिर्फ आश्वासनों का नहीं है. पाकिस्तान की हालत खुद डगमगा रही है. उसकी अर्थव्यवस्था कर्ज के नीचे दबी है. सेना अंदरूनी विद्रोहों और अफगान बॉर्डर से लगातार आती चुनौतियों से जूझ रही है. ऐसे में चीन को अब ये साफ लगने लगा है कि पाकिस्तान वादे करता तो है, लेकिन ज़मीन पर भरोसे के लायक कुछ नहीं होता. आसिम मुनीर जैसे जनरल, जिनकी छवि सख्त फैसलों वाली मानी जाती है, वो भी इस बार बीजिंग में असहाय और असहज नज़र आए. CPEC जैसे बहुचर्चित प्रोजेक्ट अब खुद चीन के लिए एक रिस्क बनते जा रहे हैं.
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