Gen-Z लड़ाके सरकार गिराने में हैं माहिर, इन देशों में करा चुके हैं तख्तापलट, क्या अब नेपाल की बारी?

दुनिया भर में एक नई सामाजिक और राजनीतिक शक्ति तेजी से उभर रही है- Gen-Z, यानी वे युवा जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए हैं.

Gen-Z fighters are experts in overthrowing governments
प्रतिकात्मक तस्वीर/ Social Media

दुनिया भर में एक नई सामाजिक और राजनीतिक शक्ति तेजी से उभर रही है- Gen-Z, यानी वे युवा जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए हैं. यह पीढ़ी अब न केवल तकनीक की दुनिया में आगे है, बल्कि शासन, लोकतंत्र और जवाबदेही के सवालों पर भी सरकारों को चुनौती दे रही है.

नेपाल, जहां हाल ही में सोशल मीडिया पर बैन और सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं का गुस्सा फूटा है, Gen-Z आंदोलन की ताज़ा मिसाल बन गया है. संसद भवन में घुसने वाले प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या इसी पीढ़ी के युवाओं की है. यह अकेला उदाहरण नहीं है हाल के वर्षों में कई देशों में Gen-Z के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सत्ता की चूलें हिला दी हैं और तख्तापलट तक करा दिए हैं.

किस-किस देश में Gen-Z ने इतिहास रचा?

सूडान:

साल 2019 में, अफ्रीकी देश सूडान में तानाशाह ओमर अल-बशीर की सत्ता को Gen-Z के आंदोलन ने उखाड़ फेंका. यह आंदोलन 2018 में तब शुरू हुआ, जब जीवन की बुनियादी चीज़ों जैसे रोटी और ईंधन के दाम बेतहाशा बढ़ गए. शुरुआत में यह आंदोलन आर्थिक मुद्दों तक सीमित था, लेकिन जल्द ही राजनीतिक रंग पकड़ गया.

सूडानी युवाओं ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर पूरे देश में विरोध फैलाया. “सूडानी प्रोफेशनल एक्टिविज्म” नाम की संस्था बनाई गई, जो विरोध की रणनीति, मीडिया मैनेजमेंट और शांतिपूर्ण विरोध की निगरानी कर रही थी. 2019 में अंततः बशीर को सत्ता छोड़नी पड़ी.

श्रीलंका:

2022 में, भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका में आर्थिक संकट, महंगाई और भ्रष्टाचार ने आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया. राजपक्षे परिवार पर सत्ता के दुरुपयोग और सरकारी धन की बर्बादी के आरोप लगने लगे.

Gen-Z की भागीदारी से ‘गोटा गो होम’ नाम का आंदोलन पूरे देश में फैल गया. प्रदर्शनकारियों ने राजधानी कोलंबो को घेर लिया. भारी जनदबाव के आगे तत्कालीन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को जुलाई 2022 में देश छोड़ना पड़ा. इसके बाद सत्ता में अस्थायी सरकार बनी और 2024 में हुए चुनावों में एक वामपंथी गठबंधन सत्ता में आया.

थाईलैंड:

2020-2021 में, थाईलैंड में प्रधानमंत्री प्रयुत चान-ओ-चा के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ गुस्सा चरम पर पहुंच गया. सरकार पर सैन्य तानाशाही और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने के आरोप लगे.

Gen-Z छात्रों और युवाओं ने विरोध की कमान संभाली. उन्होंने दो प्रमुख मांगें रखीं:

  • प्रधानमंत्री का इस्तीफा
  • नया संविधान, ताकि सेना का राजनीति में हस्तक्षेप खत्म हो

इस आंदोलन में छात्र संगठनों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों की भागीदारी रही. लगातार दबाव के चलते प्रयुत चान को अंततः इस्तीफा देना पड़ा और चुनाव कराए गए. यह बदलाव पूरी तरह युवा शक्ति की देन था.

बांग्लादेश:

जुलाई 2024 में, बांग्लादेश में Gen-Z की अगुआई में बड़ा विरोध तब शुरू हुआ जब शेख हसीना सरकार के खिलाफ सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति को लेकर असंतोष बढ़ा. युवाओं ने महसूस किया कि प्रणाली में पारदर्शिता की कमी है और योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो रहा है.

सरकार ने विरोध को कुचलने के लिए बल प्रयोग किया, जिसमें कई युवा घायल हुए. लेकिन यह कार्रवाई उल्टी साबित हुई आंदोलन और उग्र हो गया. अंततः 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को देश छोड़कर जाना पड़ा और एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ. नई संविधान संशोधन प्रक्रिया भी शुरू हुई है, जिसमें युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही.

नेपाल में क्या हुआ?

काठमांडू की सड़कों पर युवा वर्ग का गुस्सा तब भड़क उठा, जब नेपाल सरकार ने 3 सितंबर 2025 को 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगा दिया. इसके पीछे सरकार का तर्क था कि इन प्लेटफॉर्म्स ने नेपाल में रजिस्ट्रेशन नहीं कराया. लेकिन जनता का मानना था कि यह कदम सरकार की आलोचना को दबाने के लिए उठाया गया है.

युवाओं ने संसद भवन की घेराबंदी की, और कुछ प्रदर्शनकारी संसद में घुस गए. इसके बाद कर्फ्यू लागू कर दिया गया और सेना को हस्तक्षेप करना पड़ा. अब तक 9 लोगों की मौत और 80 से अधिक के घायल होने की खबर है. Gen-Z की अगुआई में हो रहे इस आंदोलन ने नेपाल की सरकार के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

ये भी पढ़ें- नेपाल की संसद में घुसे प्रदर्शनकारी, सोशल मीडिया बैन का कर रहे विरोध, सेना की फायरिंग में 9 की मौत, Video