यूरोप को अक्सर ठंडी जलवायु वाले महाद्वीप के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस समय फ्रांस की तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आ रही है. यहां की सड़कें तपते तवे जैसी हो गई हैं, लोग दिन के समय घरों से निकलने से बच रहे हैं और अस्पतालों में गर्मी से प्रभावित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कई शहरों में पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है, जबकि कुछ इलाकों में तापमान ने पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह केवल एक सामान्य हीटवेव नहीं, बल्कि बदलती जलवायु का गंभीर संकेत है, जिसे अब नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है.
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी से जूझ रहा है फ्रांस
फ्रांस इस समय अभूतपूर्व गर्मी की चपेट में है. राजधानी पेरिस समेत देश के कई हिस्सों में तापमान ने पिछले डेढ़ सौ वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पेरिस में इस सप्ताह 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले दिनों की संख्या इतिहास में सबसे ज्यादा दर्ज की गई है. वहीं दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र पिस्सॉस में तापमान 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि पूरे देश का औसत तापमान करीब 29.8 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया.
हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि फ्रांस के आधे से अधिक हिस्से में रेड हीट अलर्ट लागू किया गया है. तेज गर्मी के कारण 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. इसके अलावा, गर्मी से राहत पाने के लिए नदियों और झीलों में उतरने वाले लोगों के डूबने की घटनाओं में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है.
आखिर फ्रांस में इतनी भीषण गर्मी क्यों पड़ रही है?
विशेषज्ञों के अनुसार इस असाधारण गर्मी की सबसे बड़ी वजह "हीट डोम" है. यह वायुमंडल की ऐसी स्थिति होती है, जिसमें ऊपरी स्तर पर एक शक्तिशाली उच्च दबाव का क्षेत्र विकसित हो जाता है. यह क्षेत्र एक ढक्कन की तरह काम करता है और गर्म हवा को अपने भीतर फंसा लेता है.
जब यह गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती तो लगातार नीचे की ओर दबती रहती है. नीचे आते समय हवा और अधिक गर्म होती जाती है, जिससे सतह का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है. फ्रांस के ऊपर बना यह हीट डोम कई दिनों तक स्थिर रहा, जिसके कारण तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बनाता चला गया और लोगों को राहत नहीं मिल सकी.
यूरोप में गर्मी ज्यादा खतरनाक क्यों साबित होती है?
यूरोप में गर्मी केवल तापमान बढ़ने का मामला नहीं है. यहां की जीवनशैली और बुनियादी ढांचा भी इस समस्या को और गंभीर बना देता है. यूरोपीय देशों के अधिकांश घर सर्द मौसम को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं. इनकी मोटी दीवारें और बेहतर इन्सुलेशन सर्दियों में तो गर्माहट बनाए रखते हैं, लेकिन गर्मियों में यही संरचना घरों के अंदर की गर्मी को बाहर निकलने नहीं देती. इसके विपरीत भारत में अधिकांश घरों में प्राकृतिक हवा के आने-जाने की व्यवस्था अधिक होती है.
इसके अलावा यूरोप के कई देशों में एयर कंडीशनर का इस्तेमाल अभी भी सीमित है. इसलिए जब तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है तो लोगों के पास राहत के विकल्प कम रह जाते हैं. शहरों में कंक्रीट की इमारतें और चौड़ी सड़कें दिनभर गर्मी को अपने भीतर समेट लेती हैं और रात में भी धीरे-धीरे उसे छोड़ती रहती हैं. इस कारण रात का तापमान भी सामान्य नहीं हो पाता.
नमी यानी उमस भी इस परेशानी को कई गुना बढ़ा देती है. जब हवा में नमी अधिक होती है तो शरीर का पसीना जल्दी नहीं सूखता और शरीर अपनी प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाता. यही वजह है कि वास्तविक तापमान से कहीं अधिक गर्मी महसूस होती है.
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई खतरे की तीव्रता
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि आज दिखाई देने वाली इस तरह की हीटवेव कुछ दशक पहले लगभग असंभव मानी जाती थी. शोधकर्ताओं के अनुसार यदि 1970 के दशक में ऐसी स्थिति बनती भी, तो तापमान आज की तुलना में कई डिग्री कम रहता.
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ रही ग्रीनहाउस गैसों ने पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ाया है. इसी कारण अब हीटवेव पहले की तुलना में ज्यादा तीव्र, ज्यादा लंबी और ज्यादा घातक होती जा रही हैं. यूरोप उन क्षेत्रों में शामिल है जहां वैश्विक औसत की तुलना में तापमान कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है.
'ट्रॉपिकल नाइट्स' भी बन रही हैं बड़ी चुनौती
फ्रांस में एक और चिंता का विषय "ट्रॉपिकल नाइट्स" हैं. इसका मतलब ऐसी रातों से है, जब तापमान सामान्य स्तर तक नहीं गिरता और पूरी रात गर्मी बनी रहती है. रात में शरीर को आराम और ठंडक नहीं मिलने से लोगों की नींद प्रभावित होती है. लगातार कई दिनों तक ऐसा होने पर शरीर पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा काफी बढ़ जाता है. बुजुर्ग, बच्चे और पहले से बीमार लोग इस स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं.
क्या अल-नीनो जिम्मेदार है?
इस बार वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा हीटवेव का मुख्य कारण अल-नीनो नहीं है. उनके अनुसार इसके पीछे सबसे बड़ा कारण मानव गतिविधियों से होने वाला जलवायु परिवर्तन है.
कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के लगातार उपयोग से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है. यही गैसें पृथ्वी की गर्मी को अंतरिक्ष में जाने से रोकती हैं और वैश्विक तापमान लगातार बढ़ाती हैं. इसका सीधा असर अब मौसम के चरम रूपों के रूप में दिखाई देने लगा है.
भविष्य के लिए क्या है रास्ता?
विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रांस में पैदा हुई यह स्थिति केवल एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है. यदि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम नहीं की गई और स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से नहीं अपनाया गया तो आने वाले वर्षों में ऐसी भीषण हीटवेव सामान्य घटना बन सकती हैं.
सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्पों को बढ़ावा देना, जंगलों का संरक्षण करना, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना और ऐसी शहरी योजनाएं तैयार करना जरूरी होगा जो बढ़ते तापमान का सामना कर सकें. साथ ही सरकारों को स्वास्थ्य व्यवस्था, जल प्रबंधन और आपदा तैयारियों को भी मजबूत करना होगा ताकि भविष्य में लोगों की जान बचाई जा सके.
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