ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मध्यस्थता कराने के डोनाल्ड ट्रंप दावों को भारत ने बार-बार खारिज किया है. दुनिया की राजनीति में कुछ पल ऐसे होते हैं, जो केवल वक्त के आईने में नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाते हैं. ऐसा ही एक पल तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव को सुलझाने की पेशकश की थी, जिसे भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था. उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक फैसले ने सिर्फ भारत का रुख स्पष्ट नहीं किया, बल्कि अमेरिका के राष्ट्रपति जैसे ताकतवर नेता को भी एक कड़ा संदेश दे दिया.
अब, इस पूरे घटनाक्रम पर एक बार फिर से चर्चा तेज हो गई है, जब यूरेशिया ग्रुप के अध्यक्ष इयान ब्रेमर ने इस मुद्दे पर एक बड़ा बयान दिया है. उनके मुताबिक, अगर प्रधानमंत्री मोदी चाहते, तो डोनाल्ड ट्रंप की बेइज्जती होने से बच सकती थी... लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया.
क्यों नहीं दिया ट्रंप के प्रस्ताव को महत्व?
ब्रेमर के इस बयान ने कई राजनीतिक हलचलों को जन्म दे दिया है. उनका कहना है कि जब ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात की थी, तो पीएम मोदी ने न सिर्फ उस दावे को खारिज किया, बल्कि सार्वजनिक मंच से यह साफ कर दिया कि भारत इस मसले पर किसी तीसरे पक्ष की भूमिका को मान्यता नहीं देता.
यह एक ऐसा फैसला था, जो कूटनीतिक लिहाज़ से बहुत साहसिक माना गया. एक ओर दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका, और दूसरी ओर भारत जो उस वक्त अपने वैश्विक कद को और मजबूत करने की कोशिश में था. फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने यह तय किया कि राष्ट्रीय स्वाभिमान और विदेश नीति के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं होगा.
इयान ब्रेमर का मानना है कि "मोदी चाहते तो ट्रंप को शर्मिंदगी से बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने सच्चाई को सामने लाना चुना. उन्होंने वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका की यह दखल भारत को स्वीकार नहीं है."
कूटनीति या राजनीतिक मजबूती का प्रदर्शन?
कई विश्लेषक मानते हैं कि पीएम मोदी का यह रुख केवल एक कूटनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि एक मजबूत घरेलू नेतृत्व की झलक भी था. भारत के लोग हमेशा से आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी नेतृत्व को पसंद करते हैं, और मोदी ने उस भावना को पूरी तरह से दर्शाया.
इयान ब्रेमर ने इसी बात को रेखांकित करते हुए कहा कि "दुनिया के कई नेता ऐसे समय में चुप रह जाते हैं, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे प्रभावशाली नेता कुछ दावा करते हैं. लेकिन मोदी ने ट्रंप को सार्वजनिक रूप से खारिज किया और इसके बावजूद ट्रंप ने इसे बर्दाश्त किया."
यह बयान यह भी दिखाता है कि आज भारत की वैश्विक स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है. भारत अब केवल विकासशील देशों की कतार में नहीं है, बल्कि अब वह निर्णय लेने वाला, नीति तय करने वाला और अपनी शर्तों पर रिश्ते निभाने वाला राष्ट्र बन चुका है.
दूसरे देशों के उदाहरण और मोदी की तुलना
ब्रेमर ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का उदाहरण देते हुए कहा कि हालांकि ट्रंप को वे पसंद नहीं करते, फिर भी उन्हें अमेरिका से अच्छी डील मिल गई. इसके विपरीत मोदी की स्थिति कहीं ज़्यादा मजबूत है. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की आंतरिक राजनीति में यह रुख बहुत फायदेमंद साबित हुआ है और इसकी छाप सुरक्षा और आर्थिक संबंधों पर भी देखने को मिल सकती है.
यह टिप्पणी सिर्फ मोदी के एक निर्णय की तारीफ नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति में भारत की उभरती ताकत को भी स्वीकार करने जैसा है. आज जब अमेरिका, चीन और रूस जैसे देश वैश्विक रणनीति तय कर रहे हैं, भारत उस बातचीत का हिस्सा बनने से नहीं हिचक रहा है, बल्कि अपनी बात डंके की चोट पर रख रहा है.
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