E Commerce Sale: फेस्टिव सीजन शुरू होते ही ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर डिस्काउंट की बाढ़ आ जाती है. कहीं 70 फीसदी छूट का दावा होता है तो कहीं कीमत आधी से भी कम नजर आती है. फ्लिपकार्ट की Big Billion Days हो या अमेजन का Great Indian Festival, इन सेल्स में मोबाइल से लेकर टीवी, कपड़े और घरेलू सामान तक पर बड़े-बड़े ऑफर दिखाई देते हैं. लेकिन यहां एक सवाल बेहद दिलचस्प है अगर कंपनियां इतने कम दाम में सामान बेच रही हैं, तो आखिर उनका फायदा कहां है?
दरअसल, फेस्टिवल सेल का पूरा खेल सिर्फ किसी प्रोडक्ट को सस्ता बेचने तक सीमित नहीं है. इसमें ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, सेलर, ब्रांड, पुराने स्टॉक, बड़ी मात्रा में खरीद-बिक्री और ग्राहकों की खरीदारी की मनोविज्ञान, सभी मिलकर काम करते हैं. यही वजह है कि भारी डिस्काउंट के बावजूद कंपनियां लंबे समय में कमाई का रास्ता निकाल लेती हैं.
डिस्काउंट का पूरा बोझ कंपनी अकेले नहीं उठाती
फ्लिपकार्ट और अमेजन जैसे प्लेटफॉर्म पर बिकने वाले ज्यादातर प्रोडक्ट सीधे इन कंपनियों के बनाए हुए नहीं होते. यहां अलग-अलग सेलर और ब्रांड अपना सामान बेचते हैं. प्लेटफॉर्म उन्हें ग्राहकों तक पहुंचने के लिए बाजार उपलब्ध कराता है और बदले में कमीशन या दूसरी फीस से कमाई करता है.
फेस्टिव सीजन में कई बार प्लेटफॉर्म अपने मार्जिन को कम करते हैं, वहीं सेलर और ब्रांड भी कीमत घटाने में हिस्सेदारी निभाते हैं. इसका मकसद एक प्रोडक्ट पर बड़ा मुनाफा कमाने के बजाय ज्यादा से ज्यादा यूनिट बेचने का होता है. अगर मार्जिन कम होने के बावजूद बिक्री का वॉल्यूम काफी बढ़ जाए, तो कुल कमाई बेहतर हो सकती है.
पुराने स्टॉक को निकालने का भी होता है मौका
बड़ी सेल कंपनियों और ब्रांड्स के लिए पुराने स्टॉक को निकालने का एक अहम जरिया भी होती है. खासकर फैशन, एक्सेसरीज और कई दूसरे कैटेगरी के प्रोडक्ट्स में पुराना स्टॉक लंबे समय तक पड़ा रहने पर कंपनी के लिए बोझ बन सकता है.
ऐसे सामान को कई बार लिक्विडेटर या दूसरे खरीदार कम कीमत पर बड़ी मात्रा में खरीद लेते हैं. इसके बाद यही प्रोडक्ट कम मार्जिन के साथ ऑनलाइन सेल में पहुंच सकता है. यानी जिस सामान को कंपनी के लिए सामान्य कीमत पर बेचना मुश्किल हो सकता था, उसे डिस्काउंट के जरिए तेजी से बाजार से बाहर किया जाता है.
एक सामान पर कम कमाई लेकिन हजारों की बिक्री
फेस्टिव सेल का एक बड़ा फॉर्मूला है वॉल्यूम. जब किसी प्रोडक्ट की बिक्री बहुत बड़ी संख्या में होती है तो उत्पादन, खरीद और लॉजिस्टिक्स जैसी लागत प्रति यूनिट कम करने का फायदा मिल सकता है. इसका कुछ हिस्सा ग्राहक को कम कीमत के रूप में दिया जाता है.
मोबाइल, लैपटॉप, टीवी, एसी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स में यह रणनीति खास तौर पर देखने को मिलती है. एक यूनिट पर कम कमाई होने के बावजूद अगर हजारों या लाखों यूनिट बिक जाएं, तो कुल कारोबार काफी बड़ा हो जाता है.
'अभी नहीं खरीदा तो मौका चला जाएगा' वाली रणनीति
फेस्टिवल सेल में सिर्फ कीमत ही ग्राहक को प्रभावित नहीं करती, बल्कि खरीदारी का मनोविज्ञान भी अहम भूमिका निभाता है. यही वजह है कि कंपनियां सीमित समय के ऑफर, काउंटडाउन और 'लिमिटेड स्टॉक' जैसे संदेशों का इस्तेमाल करती हैं.
इसे FOMO यानी Fear of Missing Out कहा जाता है. ग्राहक को लगता है कि अगर उसने अभी खरीदारी नहीं की तो शायद यही प्रोडक्ट बाद में इतनी कम कीमत पर नहीं मिलेगा. सेल के दौरान बड़े चेहरों और लोकप्रिय विज्ञापनों के जरिए भी इसी तरह का माहौल बनाया जाता है. नतीजा यह होता है कि कई लोग अपनी जरूरत से ज्यादा सामान भी खरीद लेते हैं.
बड़ी छूट देखकर हमेशा बड़ी बचत नहीं होती
सेल के दौरान दिखाई जाने वाली डिस्काउंट वाली कीमत को देखकर तुरंत खरीदारी करना हमेशा सही फैसला नहीं होता. कुछ मामलों में प्रोडक्ट की पुरानी कीमत और मौजूदा सेल कीमत के बीच का अंतर बड़ा दिखाया जाता है, जिससे ऑफर बेहद आकर्षक नजर आता है.
कई बार वेबसाइट पर टाइमर या कम स्टॉक का संकेत भी खरीदारी की जल्दबाजी बढ़ा सकता है. वहीं कुछ ऑफर्स में भारी डिस्काउंट दिखने के बावजूद प्रोडक्ट उपलब्ध ही नहीं होता या थोड़ी देर में आउट ऑफ स्टॉक हो जाता है. इसलिए ग्राहक के लिए जरूरी है कि वह किसी बड़े ऑफर को देखकर खरीदने से पहले अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर कीमत जरूर जांचे.
असली कमाई सिर्फ प्रोडक्ट बेचने से नहीं
ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए फेस्टिवल सेल का लक्ष्य हर प्रोडक्ट पर ज्यादा मुनाफा कमाना नहीं होता. कई बार कुछ सामान कम मार्जिन पर बेचकर प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों की संख्या और कुल ऑर्डर बढ़ाने पर जोर दिया जाता है.
एक बार ग्राहक किसी प्लेटफॉर्म से खरीदारी करने का आदी हो जाए तो भविष्य में वह दूसरी कैटेगरी के प्रोडक्ट भी वहीं खरीद सकता है. इसके अलावा प्लेटफॉर्म को विज्ञापन, कमीशन, लॉजिस्टिक्स और दूसरी सेवाओं से भी कमाई के मौके मिलते हैं.
यानी फेस्टिवल सेल में दिखने वाली भारी छूट के पीछे एक बड़ा बिजनेस मॉडल काम करता है. वेंडर का मार्जिन, ब्रांड की रणनीति, पुराने स्टॉक की निकासी, बल्क सेलिंग और ग्राहकों को आकर्षित करने वाली मार्केटिंग इन सभी को मिलाकर कंपनियां डिस्काउंट के बावजूद अपना कारोबार बढ़ाने की कोशिश करती हैं.
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