जमीन के अंदर धंस रही है दिल्ली, डेंजर जोन में आए सैकड़ों बिल्डिंग्‍स और लाखों लोग, देखें रिपोर्ट

राजधानी दिल्ली में एक गंभीर पर्यावरणीय संकट धीरे-धीरे शहर की दहलीज तक पहुँच चुका है.

Delhi is sinking underground buildings in danger zone
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में एक गंभीर पर्यावरणीय संकट धीरे-धीरे शहर की दहलीज तक पहुँच चुका है. हाल ही में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दिल्ली-NCR में जमीन धंसाव (Land Subsidence) की दर खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है, और अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दशकों में शहर में व्यापक तबाही की संभावना है.

‘Building Damage Risk in Sinking Indian Megacities’ नामक स्टडी, जो कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, वर्जीनिया टेक और कनाडा स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई है, में कहा गया है कि दिल्ली में जमीन धंसने की अधिकतम दर 51 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक पहुँच चुकी है. इस प्रक्रिया से 2,264 इमारतें गंभीर संरचनात्मक जोखिम (High Structural Risk) में हैं, और करीब 17 लाख (1.7 मिलियन) लोग सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं.

प्रमुख भारतीय महानगरों का विश्लेषण

अध्ययन में पांच प्रमुख भारतीय महानगरों- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु का विश्लेषण किया गया. इसमें दिल्ली तीसरे स्थान पर है, जहां 196.27 वर्ग किलोमीटर भूमि धंसाव की समस्या से प्रभावित है. मुंबई (262.36 वर्ग किमी) और कोलकाता (222.91 वर्ग किमी) इससे आगे हैं.

विशेष रूप से दिल्ली-NCR के बिजवासन, फरीदाबाद और गाजियाबाद क्षेत्रों में जमीन धंसने की दर क्रमशः 28.5 मिमी, 38.2 मिमी और 20.7 मिमी प्रति वर्ष पाई गई. दिल्‍ली के द्वारका क्षेत्र में कुछ जगहों पर जमीन 15.1 मिमी प्रति वर्ष की दर से ऊपर उठने की घटना भी देखी गई.

खतरे के पीछे की वजहें

शोध में जमीन धंसाव के लिए मुख्य तीन कारणों की पहचान की गई है:

  • ग्राउंडवाटर का अत्यधिक दोहन – दिल्ली में भूजल का अत्यधिक उपयोग जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) के संकुचन की प्रक्रिया को तेज करता है.
  • मानसून की अनियमितता – मौसम में बदलाव और असमान वर्षा पैटर्न से भूजल स्तर प्रभावित हो रहा है.
  • क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) – चरम मौसम और तापमान में अस्थिरता भूमि स्थिरता पर दबाव डाल रही है.

शोध के अनुसार, पारंपरिक तकनीकों से इमारतों की संरचनात्मक सुरक्षा का आकलन करना कठिन है. दरारें हमेशा धंसाव का संकेत नहीं होतीं और दरार का न होना भी सुरक्षा की गारंटी नहीं देता.

रिपोर्ट में भविष्य की चेतावनी

रिपोर्ट में चेताया गया है कि अगले 30 वर्षों में दिल्ली में लगभग 3,169 इमारतें अत्यधिक जोखिम में होंगी. 50 साल बाद यह संख्या बढ़कर 11,457 इमारतों तक पहुँच सकती है. अध्ययन में यह भी कहा गया है कि मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे अन्य महानगरों में भी इमारतों के धंसने और संरचनात्मक क्षति की आशंका बढ़ रही है.

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सतही जल और भूजल की आपूर्ति मानसूनी वर्षा पर निर्भर है, लेकिन मानसून की अनियमितता और जलवायु परिवर्तन के कारण एक्विफर (भूजल स्तर) पर दबाव बढ़ गया है.

समाधान और सुझाव

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि:

  • भू-धंसाव और इमारतों की क्षति के लिए एक समग्र और मानकीकृत डेटाबेस तैयार किया जाए.
  • शहरों में सतत जल प्रबंधन और भूजल संरक्षण के उपाय लागू किए जाएं.
  • निर्माण और नगर नियोजन में स्थिरता और दीर्घकालिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए.

अध्ययन का निष्कर्ष साफ है: जलवायु परिवर्तन, मौसम की चरम परिस्थितियां और भू-धंसाव का सम्मिलित प्रभाव भारतीय शहरी बुनियादी ढांचे पर गंभीर खतरा बन रहा है. यदि समय रहते प्रशासन, नगर निगम और नागरिक इस दिशा में कदम नहीं उठाते हैं, तो आने वाले दशकों में दिल्ली में बड़े पैमाने पर संरचनात्मक और मानव जीवन को प्रभावित करने वाले संकट का सामना करना पड़ सकता है.

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