ईरान-बहरीन तनाव के बीच 'फोर्स मेज्योर' का ऐलान, जानें कैसे वैश्विक तेल बाजार और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर

Bahrain Force Majeure: ईरान और बहरीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने बहरीन की एकमात्र तेल रिफाइनरी पर मिसाइल हमला किया, जिससे वहां उत्पादन पूरी तरह रुक गया.

Declaration of Force Majeure amid Iran-Bahrain tension global oil market economy will be affected
Image Source: Social Media

Bahrain Force Majeure: ईरान और बहरीन के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने बहरीन की एकमात्र तेल रिफाइनरी पर मिसाइल हमला किया, जिससे वहां उत्पादन पूरी तरह रुक गया.

इसके बाद बहरीन ने अपने सभी तेल शिपमेंट और अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर ‘फोर्स मेज्योर’ लागू करने की घोषणा कर दी. यह कदम तकनीकी जरूर लगता है, लेकिन इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, महंगाई और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है.

क्या होता है ‘फोर्स मेज्योर’?

फोर्स मेज्योर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कानूनी समझौतों में इस्तेमाल होने वाला एक विशेष प्रावधान है. जब किसी कंपनी या देश के साथ ऐसी अप्रत्याशित घटना हो जाती है जो उसके नियंत्रण से बाहर हो, जैसे युद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी या बड़ा हमला, तो वह इस क्लॉज का उपयोग कर सकता है. ऐसी स्थिति में प्रभावित पक्ष अपने अनुबंध की शर्तें पूरी न कर पाने के लिए जिम्मेदार नहीं माना जाता और उस पर कोई कानूनी कार्रवाई या जुर्माना नहीं लगाया जा सकता.

बहरीन के फैसले का मतलब

बहरीन की रिफाइनरी पर हमले के बाद वहां तेल शोधन और निर्यात का काम रुक गया है. फोर्स मेज्योर लागू करने का अर्थ यह है कि बहरीन फिलहाल अपने ग्राहकों को तेल की आपूर्ति नहीं कर पाएगा और इसके लिए उस पर कोई अनुबंधीय दंड नहीं लगाया जा सकेगा. इस घटना ने खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे और खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

तेल बाजार के लिए क्यों बड़ी खबर है

बहरीन भले ही क्षेत्रफल में छोटा देश है, लेकिन ऊर्जा बाजार में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. बहरीन की सरकारी कंपनी BAPCO की रिफाइनरी खाड़ी क्षेत्र की सबसे पुरानी रिफाइनरियों में से एक है.

रिफाइनरी बंद होने का मतलब है कि वहां से निकलने वाले पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और नेफ्था जैसे उत्पादों की आपूर्ति वैश्विक बाजार में कम हो जाएगी. इससे सप्लाई और डिमांड के संतुलन पर असर पड़ सकता है.

वैश्विक बाजारों पर संभावित प्रभाव

इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी की आशंका बढ़ गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर क्षेत्रीय तनाव जारी रहता है तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर सकती हैं. इसके अलावा युद्ध प्रभावित इलाकों से गुजरने वाले जहाजों के बीमा प्रीमियम में भी तेज बढ़ोतरी हो सकती है. 

इससे समुद्री माल ढुलाई महंगी हो जाएगी और वैश्विक व्यापार की लागत बढ़ सकती है. ऊर्जा संकट की आशंका के चलते दुनिया के कई शेयर बाजारों में भी अस्थिरता देखी जा सकती है, क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ने से कंपनियों की लागत और महंगाई दोनों बढ़ जाती हैं.

भारत पर संभावित असर

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है. हालांकि भारत बहरीन से सीमित मात्रा में तेल खरीदता है, लेकिन वैश्विक बाजार में कीमत बढ़ने का असर भारत पर भी पड़ेगा. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों को ज्यादा कीमत पर तेल खरीदना पड़ेगा. 

इसका असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है. डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे सब्जियां, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं के दाम भी बढ़ सकते हैं. यानी तेल संकट का असर आम लोगों के घरेलू बजट तक पहुंच सकता है.

रुपये और सरकारी खर्च पर दबाव

तेल आयात के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये पर दबाव पड़ सकता है. कमजोर रुपये का असर विदेश में पढ़ाई, इलेक्ट्रॉनिक सामान और अंतरराष्ट्रीय यात्रा जैसी चीजों पर भी पड़ता है. इसके अलावा तेल आयात पर ज्यादा खर्च होने से सरकार का राजकोषीय घाटा भी बढ़ सकता है, जिससे विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर असर पड़ सकता है.

भारत की तैयारी और विकल्प

ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपने आयात स्रोतों को विविध बनाया है. फिलहाल भारत रूस से बड़ी मात्रा में रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीद रहा है, जिससे खाड़ी देशों पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है.

इसके अलावा भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल आपात स्थिति में कुछ समय तक किया जा सकता है. जरूरत पड़ने पर भारत इराक और यूएई जैसे अन्य तेल उत्पादक देशों से आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश भी कर सकता है.

ये भी पढ़ें- रिलीज से पहले ही 'धुरंधर 2' का लोगों पर दिख रहा क्रेज, इस मामले में 'स्त्री 2' को पछाड़ा; जानें पूरी डिटेल