India-Taiwan mega deal on Rare Earth Minerals: दुनिया इस समय एक ऐसे नए “खजाने” की तलाश में है, जिसकी कीमत तेल या सोने से भी कहीं ज्यादा है. यह खजाना है “रेयर अर्थ मिनरल्स”, यानी दुर्लभ मृदा तत्व, वे कीमती खनिज जो आधुनिक तकनीक, रक्षा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों और सेमीकंडक्टर चिप्स की रीढ़ माने जाते हैं. इनकी अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज हर विकसित और विकासशील देश इन्हें हासिल करने की दौड़ में लगा है. इसी दौड़ ने हाल ही में एक नई रणनीतिक साझेदारी को जन्म दिया है, भारत और ताइवान के बीच, जिसने चीन की नींद उड़ा दी है.
अंग्रेजी पोर्टल english.cw.com की एक रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली में आयोजित “ताइवान एक्सपो 2025” में ताइवान ने भारत के सामने एक बेहद अहम प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव के तहत ताइवान ने भारत के रेयर अर्थ मिनरल्स तक पहुंच की इच्छा जताई है. बदले में ताइवान अपनी सेमीकंडक्टर तकनीक और निवेश भारत को देने को तैयार है.
ताइवान ने भारत को दिया बड़ा प्रस्ताव
ताइवान एक्सटर्नल ट्रेड डेवलपमेंट काउंसिल (TAITRA) के उपनिदेशक केवेन चेंग ने कहा कि ताइवान के लिए भारत एक रणनीतिक भागीदार बन सकता है क्योंकि ताइवान को अपने इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों को विकसित करने के लिए दुर्लभ खनिजों की आवश्यकता है. लेकिन इसी प्रस्ताव ने बीजिंग की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि ताइवान भारत के साथ ऐसे समय में साझेदारी बढ़ा रहा है जब चीन ने खुद ही रेयर अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर नई पाबंदियां लगा दी हैं.
चीन के नए रेयर अर्थ नियम और वैश्विक असर
चीन ने हाल ही में दुर्लभ मृदा खनिजों के निर्यात पर दो चरणों में नए नियम लागू करने की घोषणा की है, पहला 8 नवंबर और दूसरा 1 दिसंबर से. दरअसल, बीजिंग ने अप्रैल 2025 में ही कई तरह के खनन और प्रोसेसिंग निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए थे. अब इन प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ा दिया गया है. चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि ये पाबंदियां “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम चीन की भू-राजनीतिक शक्ति बढ़ाने की एक बड़ी चाल है. इन प्रतिबंधों का सीधा असर वैश्विक रक्षा उद्योग और तकनीकी विनिर्माण पर पड़ेगा, क्योंकि दुनिया के लगभग सभी देशों की उन्नत तकनीकें इन खनिजों पर निर्भर हैं.
दुर्लभ खनिजों में चीन का वैश्विक दबदबा
चीन इस समय दुनिया के 70% से ज्यादा रेयर अर्थ खनन और 90% से अधिक प्रसंस्करण पर नियंत्रण रखता है. इन खनिजों का इस्तेमाल स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहनों, रॉकेट, मिसाइल सिस्टम, सोलर पैनल और सेमीकंडक्टर चिप्स में किया जाता है. यानी अगर चीन किसी देश को सप्लाई रोक दे, तो उसकी तकनीकी और रक्षा उत्पादन पर तुरंत असर पड़ सकता है. यही कारण है कि चीन की यह पकड़ वैश्विक चिंता का कारण बन गई है.
भारत-ताइवान साझेदारी से चीन की चिंता
भारत और ताइवान दोनों ही देशों के चीन से संबंध बेहद जटिल हैं. भारत की चीन से लगभग 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो बेहद संवेदनशील और सैन्य रूप से सक्रिय मानी जाती है. वहीं ताइवान पिछले कई वर्षों से चीनी आक्रमण और धमकियों का सामना कर रहा है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यही साझा खतरा दोनों देशों को करीब ला रहा है. भारत और ताइवान अब एक ऐसे आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते की दिशा में बढ़ रहे हैं, जो भविष्य में चीन की “रेयर अर्थ मोनोपॉली” को चुनौती दे सकता है.
भारत के पास तीसरे सबसे बड़े रेयर अर्थ भंडार
पोर्टल convergence-now.com की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के पास करीब 6.9 मिलियन (69 लाख) मीट्रिक टन रेयर अर्थ मिनरल्स का विशाल भंडार है. यह भंडार भारत को दुनिया में तीसरे स्थान पर लाता है.
हालांकि, इन संसाधनों का अब तक पूरी क्षमता से दोहन नहीं हो पाया है. अगर भारत इनका पूर्ण उपयोग करे, तो वह न सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहन बैटरियों बल्कि रक्षा प्रणालियों और हाई-टेक इंडस्ट्री के लिए भी एक वैश्विक सप्लायर बन सकता है.
ताइवान का भारत में सेमीकंडक्टर निवेश
ताइवान आज दुनिया के 60% से अधिक सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन करता है. वह अब भारत में बड़े पैमाने पर निवेश कर नई आपूर्ति श्रृंखला बनाना चाहता है. TAITRA के अधिकारी केवेन चेंग ने घोषणा की कि पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन (PSMC) और भारत का टाटा समूह मिलकर अगले साल भारत में चिप्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू करेंगे.
ताइवान की कई और कंपनियाँ भी भारत में निवेश की तैयारी में हैं. उन्हें भारत का विशाल बाजार, प्रतिभाशाली इंजीनियरिंग कार्यबल और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति बहुत आकर्षक लग रही है.
ताइवान क्यों चाहता है भारतीय रेयर अर्थ मिनरल्स?
ताइवान के पास खुद के रेयर अर्थ भंडार बेहद सीमित हैं. उसके उद्योग चीन से सीमित मात्रा में ही खनिज आयात करते हैं, जो वैश्विक आयात का मात्र 2.49% है. हालांकि यह मात्रा कम है, लेकिन ताइवान के लिए यह रणनीतिक रूप से बेहद अहम है. इसका कारण यह है कि ताइवान का अर्धचालक (सेमीकंडक्टर) उद्योग, जो उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इन्हीं खनिजों पर निर्भर करता है.
अगर चीन इनकी सप्लाई रोक दे, तो ताइवान की चिप मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री पर गंभीर असर पड़ सकता है. इसलिए ताइवान अब भारत जैसे वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में है ताकि वह अपनी आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित रख सके.
भारत में ताइवान के लिए निवेश का अवसर
भारत और ताइवान दोनों के पास एक-दूसरे को बहुत कुछ देने की क्षमता है. भारत के पास रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, लेकिन उसके खनन और प्रोसेसिंग क्षेत्र को निवेश और तकनीकी सहयोग की जरूरत है.
वहीं ताइवान के पास अत्याधुनिक तकनीक, पूंजी और अनुभव है. ताइवान भारत में खनन परियोजनाओं में प्रत्यक्ष निवेश कर सकता है. इससे भारत का उत्पादन बढ़ेगा, जबकि ताइवान को एक स्थायी आपूर्ति स्रोत मिलेगा.
‘राष्ट्रीय खनिज भंडार योजना’
चीन के निर्यात प्रतिबंधों के जवाब में भारत ने राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज भंडार (National Critical Minerals Reserve) बनाने की दिशा में कदम उठाया है. इस योजना के तहत भारत दो महीने तक का रणनीतिक भंडार बनाएगा ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट आने पर घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकें. सरकार निजी क्षेत्र के निवेश को भी इसमें शामिल करना चाहती है. भारत के पास लगभग 8.52 मिलियन टन रेयर अर्थ खनिज हैं, यह ताइवान के लिए भी एक बड़ा निवेश अवसर बन सकता है.
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