बीजिंग: जब पूरी दुनिया का ध्यान मध्य पूर्व की तनावपूर्ण स्थिति पर है, तब चीन ने अपनी योजनाओं पर और तेजी से काम करना शुरू कर दिया है. चीन, जो लंबे समय से दक्षिण चीन सागर के अधिकांश हिस्से पर अपना दावा करता रहा है, अब इस क्षेत्र को और अधिक नियंत्रित करने के लिए एक नई रणनीति के तहत कार्य कर रहा है. सैटेलाइट तस्वीरों से यह खुलासा हुआ है कि चीन ने एंटेलोप रीफ पर एक नया द्वीप बनाना शुरू कर दिया है. यह कदम चीन की ताकत को इस सामरिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में और अधिक मजबूत कर सकता है.
दक्षिण चीन सागर: सामरिक और आर्थिक दृष्टि से अहम
दक्षिण चीन सागर वह क्षेत्र है, जहां हर साल दुनिया के समुद्री व्यापार का एक बड़ा हिस्सा चलता है. यह मार्ग व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसका चीन के लिए सामरिक महत्व भी काफी ज्यादा है. बीजिंग का दावा इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर है, और यह दावा उसकी कई पड़ोसी देशों के साथ विवाद का कारण बन चुका है. यह क्षेत्र वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया और ब्रुनेई जैसे देशों के समुद्री सीमा क्षेत्र में आता है, जिससे विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है.
वियतनाम के पास बढ़ता चीनी प्रभाव
चीन का यह कदम केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है. 1974 में, चीन की सेना ने दक्षिण वियतनाम से पैरासेल द्वीपों पर कब्जा कर लिया था और तब से इस क्षेत्र में अपने अधिकार को मजबूत किया है. बीजिंग ने यहां 20 चौकियां बनाई हैं, जिनमें से कुछ पर तो सेना भी तैनात है. अब एंटेलोप रीफ पर तेजी से निर्माण कार्य चल रहा है, जो इस क्षेत्र में चीन की स्थिति को और भी मजबूत कर सकता है.
सैटेलाइट तस्वीरों से खुलासा
वंटोर के सैटेलाइट विश्लेषण के अनुसार, एंटेलोप रीफ पर अब तक लगभग 1490 एकड़ ज़मीन तैयार की जा चुकी है. यह ज़मीन मुख्य रूप से अक्टूबर के बाद बनाई गई है, जब निर्माण कार्य का नया चरण शुरू हुआ. यह आकार में दक्षिण चीन सागर के सबसे बड़े कृत्रिम द्वीप, मिसचीफ रीफ के बराबर है और वुडी द्वीप के आकार का दो-तिहाई है. इस निर्माण से चीन को इस क्षेत्र में अपनी पकड़ और भी मजबूत करने का अवसर मिल रहा है.
चीनी सैन्य ठिकानों के लिए नया आधार
सेंटर फ़ॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ (CSIS) के अनुसार, एंटेलोप रीफ अब इतना बड़ा हो चुका है कि यह वहां मौजूद सैन्य ठिकानों के लिए बुनियादी ढांचे को संभाल सकता है. इसमें तटीय रक्षा प्रणालियाँ, ज़मीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़ी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं. इस नए निर्माण से चीन को न केवल सामरिक दृष्टि से लाभ होगा, बल्कि यह उसके सैन्य वर्चस्व को भी और मजबूत करेगा.
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