चीन और ताइवान के बीच बढ़ते तनाव की आहट अब और भी स्पष्ट होती जा रही है. एक तरफ जहां कूटनीतिक बयानबाज़ी तेज़ हो गई है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर युद्ध की तैयारी भी तेज़ी से बढ़ रही है. इस बदलते परिदृश्य में पारंपरिक सैन्य बल से कहीं ज्यादा अब तकनीकी बढ़त निर्णायक साबित हो सकती है और इसमें सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं ड्रोन, यानी अनमैन्ड एयरक्राफ्ट.
जहां चीन बीते दो दशकों से इस दिशा में लगातार निवेश करता आ रहा है, वहीं ताइवान ने हाल ही में इस खतरे की गंभीरता को महसूस किया है. अब जब युद्ध के मैदान में AI-संचालित ड्रोन, ऑटोनॉमस सिस्टम और स्टील्थ टेक्नोलॉजी निर्णायक बनने लगे हैं, तो यह स्पष्ट है कि सिर्फ सैनिकों की संख्या और टैंक-मिसाइलों से यह जंग नहीं जीती जा सकती.
चीन की सैन्य ताकत: एक विशाल मशीनरी
ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स 2025 के अनुसार, चीन के पास 20 लाख से ज्यादा सक्रिय सैनिक हैं, जबकि ताइवान सिर्फ़ 2.15 लाख पर निर्भर है. वायुसेना की बात करें तो चीन के पास 3,309 फाइटर जेट्स और एयरक्राफ्ट हैं, जबकि ताइवान के पास यह संख्या महज 761 है. कुल मिलाकर, चाहे थलसेना हो, वायुसेना या नौसेना – हर मोर्चे पर ताइवान चीन से कई कदम पीछे है.
ड्रोन युद्ध में चीन की स्पष्ट बढ़त
चीन ने ड्रोन क्षेत्र में शुरुआत 1990 के दशक में कर दी थी. 2015 में अनुमान लगाया गया था कि आने वाले आठ वर्षों में वह 42,000 ड्रोन तैयार कर लेगा — और अब यह लक्ष्य कहीं पीछे छूट चुका है. चीन के पास अब दसियों हज़ार सैन्य ड्रोन हैं, जिनमें से कई लॉन्ग-रेंज, स्टील्थ कैपेबिलिटी और जेट-पावर्ड हैं. CSSC JARI USV-A जैसे उदाहरण इस बात का संकेत हैं कि चीन सिर्फ हवा ही नहीं, बल्कि समुद्री क्षेत्र में भी ड्रोन की मदद से प्रभुत्व बढ़ा रहा है. यह 60 मीटर लंबा, 300 टन वजनी स्वचालित नौसैनिक हथियार प्रणाली है, जो मिसाइलों से लैस है. चीन की रणनीति स्पष्ट है. तकनीक के दम पर जंग को तेज़, सटीक और लागत-प्रभावी बनाना.
ताइवान की धीमी शुरुआत और नई रणनीति
दुनिया के सबसे बड़े सेमीकंडक्टर उत्पादक देश होने के बावजूद ताइवान ने ड्रोन क्षेत्र को देर से गंभीरता से लेना शुरू किया. 2022 से पहले उसके पास सिर्फ चार श्रेणियों में कुछ सौ ड्रोन ही थे. रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन की निर्णायक भूमिका देखने के बाद ताइवान ने ‘ड्रोन नेशनल टीम’ कार्यक्रम की शुरुआत की. इस योजना के तहत घरेलू ड्रोन निर्माण को बढ़ावा देना है, ताकि युद्ध जैसी स्थिति में चीन पर निर्भर न रहना पड़े. हालांकि, वास्तविकता यह है कि ताइवानी ड्रोन निर्माता अभी भी चीन की कीमतों से मुकाबला नहीं कर पा रहे. DJI, चीन की प्रमुख कंपनी, अकेले ही वैश्विक ड्रोन बाजार के 70% हिस्से पर कब्जा रखती है. ऐसे में ताइवानी स्टार्टअप्स और रक्षा कंपनियों के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहना काफी कठिन हो गया है.
उत्पादन बनाम आवश्यकता
DSET (Democracy, Society and Emerging Technology) की रिपोर्ट बताती है कि ताइवान वर्तमान में हर साल लगभग 8,000 से 10,000 ड्रोन बना रहा है. लेकिन उसका लक्ष्य है कि 2028 तक यह आंकड़ा 1.8 लाख यूनिट्स सालाना तक पहुंच जाए. इसका मतलब है कि अगले कुछ वर्षों में ताइवान को अपने उत्पादन में 18 गुना वृद्धि करनी होगी. यह लक्ष्य सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि औद्योगिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दृष्टि से भी बेहद कठिन है.
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