Pind Daan In Gaya: धूप हल्की थी, हवा में एक आध्यात्मिक शांति तैर रही थी और फल्गु नदी के तट पर मंत्रोच्चार की गूंज थी. लेकिन इस बार गयाजी की पवित्र धरती पर पितृपक्ष मेला कुछ अलग ही रंग में नजर आया. जब रूस और यूक्रेन जैसे युद्ध से जूझते देशों के नागरिक एक साथ पिंडदान के लिए बैठे, तो यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, यह बन गया मानवता, आस्था और संस्कृति के अद्भुत संगम का प्रतीक.
गुरुवार को देवघाट की वेदियों पर अमेरिका, स्पेन, रूस और यूक्रेन से आए कुल 17 विदेशी श्रद्धालुओं ने पारंपरिक भारतीय परिधान में विधिपूर्वक पिंडदान किया. गयापाल पंडा मनोज लाल टइयां के नेतृत्व में हुए इस विशेष अनुष्ठान में 3 पुरुष और 14 महिलाएं शामिल हुईं. इन सभी की आंखों में आस्था की चमक थी और मन में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का सागर.
विदेशी भी हुए भारतीय संस्कृति के कायल
विदेश से आई श्रद्धालु सियाना ने गयाजी की धरती को "आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर" बताया. उन्होंने कहा, “यह अनुभव मेरे जीवन का हिस्सा बन गया है. यहां की संस्कृति और मान्यताएं आत्मा को गहराई तक छू लेती हैं.” वहीं अन्य श्रद्धालुओं ने पितृपक्ष मेले को हिंदू संस्कृति का जीवंत प्रतीक बताया, जो जीवन और मृत्यु के संबंध को अत्यंत सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है.
25 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किया श्राद्ध
गया जिला प्रशासन के अनुसार, अब तक करीब 25 लाख 19 हजार श्रद्धालु अपने पितरों का श्राद्ध करने गयाजी पहुंच चुके हैं. देवघाट, अक्षयवट, रामशिला और प्रेतशिला जैसी पवित्र वेदियों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ पिंडदान के लिए उमड़ रही है.
पितृपक्ष बना वैश्विक एकता का संदेशवाहक
रूस और यूक्रेन जैसे युद्धरत देशों के नागरिकों को एक साथ बैठकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते देखना यह साबित करता है कि आस्था की शक्ति न सीमाएं जानती है, न हालात. गयाजी की यह मोक्षनगरी न केवल आत्मा के उद्धार की भूमि बनी, बल्कि इसने दुनिया को यह संदेश भी दिया कि धर्म, संस्कृति और परंपरा दिलों को जोड़ सकती हैं, देशों को भी.
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