इस्लामाबाद: बलूचिस्तान में जारी विद्रोह ने एक बार फिर पाकिस्तान की सुरक्षा स्थिति को कठघरे में खड़ा कर दिया है. बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने 11 मार्च को जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर पाकिस्तान को सीधा संदेश दिया है. यह घटना केवल एक आतंकी हमला नहीं, बल्कि बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के प्रभाव और नियंत्रण को चुनौती देने वाली कार्रवाई थी.
हमले की गंभीरता और पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
इस घटना के बाद पाकिस्तान सरकार और सेना पर भारी दबाव बना है. बीएलए ने दावा किया कि 214 बंधकों को मार दिया गया जबकि पाकिस्तान सरकार इसे कमतर आंकने की कोशिश कर रही है. चार दिन बाद, बीएलए के उग्रवादियों ने नोशकी में आत्मघाती हमला कर 90 पाकिस्तानी सैनिकों को मारने का दावा किया. पाकिस्तानी सेना के अनुसार, 33 विद्रोही मारे गए, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इतने कम विद्रोही लगभग 40 घंटे तक ट्रेन को हाईजैक नहीं कर सकते थे.
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, घटनास्थल पर 100 से अधिक ताबूत ले जाए जाते देखे गए, जो पाकिस्तानी सेना के दावों पर सवाल उठाते हैं. चश्मदीदों ने भी 130-140 लाशें देखने की पुष्टि की.
बलूचिस्तान में विद्रोह और पाकिस्तानी सेना की रणनीति
बलूचिस्तान में विद्रोह कोई नया नहीं है. 1948 में पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए जाने के बाद से यह क्षेत्र लगातार संघर्ष का केंद्र बना हुआ है. 1948, 1958, 1962, 1973 और 2000 के बाद से कई विद्रोह उठे और हर बार पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीतियों ने इसे और अधिक भड़काया.
पाकिस्तान हमेशा इस विद्रोह के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराता है, लेकिन उसके पास कोई ठोस सबूत नहीं होता. विश्लेषकों का मानना है कि बलूच विद्रोह पाकिस्तान की अपनी क्रूर नीतियों का नतीजा है. 30,000 से अधिक बलूच नागरिक लापता किए जा चुके हैं, और हजारों लोग मारे जा चुके हैं.
बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग और पाकिस्तान की नाकामी
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और खनिज संपदाओं से भरपूर है, लेकिन यहां की जनता गरीबी, शोषण और अत्याचार का शिकार बनी हुई है. पाकिस्तान सरकार और सेना बलूचों के विद्रोह को आतंकवाद का नाम देकर दबाने की कोशिश करती है, लेकिन अब इसे दबाना संभव नहीं दिख रहा.
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान बलूचिस्तान को उसी तरह खो सकता है जैसे उसने 1971 में बांग्लादेश को खो दिया था. पाकिस्तानी सेना का बलूचों पर अत्याचार और विद्रोह को कुचलने की नीति लंबे समय तक नहीं चल सकती.
क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान के हाथ से निकल रहा है?
पाकिस्तान की सेना कारगिल से लेकर बलूचिस्तान तक अपने नुकसान को छिपाने के लिए मशहूर रही है. कारगिल युद्ध में भी पाकिस्तान ने अपने 2,000 सैनिकों की मौत को वर्षों तक छिपाए रखा. अब वही रणनीति वह बलूचिस्तान में भी अपना रहा है.
बलूचिस्तान में बढ़ते हमले, बीएलए की बढ़ती ताकत और पाकिस्तानी सेना की कमजोर स्थिति दर्शाती है कि यह इलाका अब पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर हो रहा है. अगर पाकिस्तान अपनी नीतियों में बदलाव नहीं लाता, तो वह एक और बड़े संकट की ओर बढ़ सकता है.
बलूचिस्तान की आज़ादी की मांग अब और अधिक तेज हो सकती है, और पाकिस्तान के लिए इसे रोकना आसान नहीं होगा.
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