न्यूयॉर्क में अगले कुछ दिनों में होने वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) सत्र को लेकर पाकिस्तान में हलचल कुछ ज़्यादा ही तेज़ है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने जा रहे हैं.
इस बार उनके साथ प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी होंगे. हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब कोई पाकिस्तानी आर्मी चीफ अमेरिकी सियासत के किसी बड़े चेहरे से मिलने के लिए विदेश दौरे पर निकले हों. फर्क बस इतना है कि इस बार पाकिस्तान खुद को एक "शांतिदूत" के रूप में पेश करना चाहता है- एक ऐसा देश जो संघर्ष नहीं, समाधान चाहता है. लेकिन असली सवाल है कि पाकिस्तान में हो क्या रहा है?
प्रधानमंत्री या सेना, कौन चला रहा पाकिस्तान?
इस सवाल का जवाब अब शायद किसी को देने की जरूरत नहीं. पाकिस्तान में सत्ता का असली केंद्र इस्लामाबाद नहीं, बल्कि रावलपिंडी है, यानी आर्मी हेडक्वार्टर. भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व करने के लिए सूट-बूट में प्रधानमंत्री कैमरों के सामने खड़े दिखते हैं, असली फैसले और रणनीतियाँ सेना तय करती है.
आसिम मुनीर की ही मिसाल लीजिए, उन्हें आप पिछले कुछ महीनों में लगातार शंघाई सहयोग संगठन (SCO) से लेकर दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शहबाज शरीफ के साथ देख चुके हैं. ये वही मंच होते हैं जहां शरीफ भाषण देते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट किसी और के लिखे होते हैं.
ट्रंप से बार-बार मुलाकात: संयोग या रणनीति?
डोनाल्ड ट्रंप को दुनिया जानती है कि वे खुद को ‘डील मेकर’ मानते हैं. उनके लिए हर संकट एक शो है और हर समाधान एक क्रेडिट लेने का मौका. चाहे वो कोरियन पेनिनसुला का मामला हो या मिडल ईस्ट, ट्रंप की नीति साफ होती है- क्रेडिट लो, चाहे किसी और ने काम क्यों न किया हो.
हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए तनाव में भी ट्रंप ने यही किया. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक की और तीन दिनों तक दोनों देशों में सैन्य टकराव की स्थिति बनी रही, तभी ट्रंप सामने आए और बोले, "मैंने दोनों न्यूक्लियर देशों को युद्ध से रोक दिया."
जबकि सच्चाई यह है कि मामला भारत-पाक DGMO (Director General of Military Operations) स्तर की बातचीत से सुलझा. फिर भी ट्रंप ने इसे अपनी "डिप्लोमैटिक जीत" बताया. पाकिस्तान ने तो यहां तक कर डाला कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की मांग शुरू कर दी.
पाकिस्तान में आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव
आज का पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है. विदेशी मुद्रा भंडार निचले स्तर पर है, महंगाई चरम पर है, IMF से कर्ज की शर्तें सख्त होती जा रही हैं, और आंतरिक अस्थिरता लगातार बढ़ रही है.
इन हालात में पाकिस्तान के लिए अमेरिका सिर्फ एक महाशक्ति नहीं, बल्कि "फंडिंग हब" बन गया है. चाहे फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) में ग्रे लिस्ट से बाहर निकलने की कोशिश हो या IMF से नया बेलआउट पैकेज हर मोर्चे पर पाकिस्तान को अमेरिका की हामी जरूरी लगती है. इसलिए, हर प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख की पहली विदेश यात्रा अमेरिका की ओर होती है.
आसिम मुनीर का यह दौरा भी उसी ‘पैटर्न’ का हिस्सा है- ट्रंप को साधो, अमेरिका को भरोसे में लो, और दुनिया को दिखाओ कि पाकिस्तान ‘शांति चाहता है’.
भारत-पाक संघर्ष: ट्रंप की शांति
आइए याद करें हालिया पहलगाम आतंकी हमला, जिसमें भारत ने 26 नागरिकों को खोया. उसके बाद भारत की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई, जिसमें जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के ठिकानों को निशाना बनाया गया, पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति को पूरी तरह कमजोर कर गई.
तीन दिनों तक चलने वाले संघर्ष के बाद भारत ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता साबित कर दी, और पाकिस्तान को यह भी अहसास हो गया कि अब युद्ध की भाषा में बात करना उसकी हैसियत में नहीं है.
ऐसे में पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ‘शांति समर्थक’ की भूमिका अपनानी शुरू कर दी- ठीक वैसे ही जैसे कोई कमजोर खिलाड़ी यह जताने की कोशिश करता है कि वह लड़ना नहीं चाहता, बल्कि मैदान में ‘न्याय’ चाहता है.
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