ईरान को घेरने की तैयारी में अमेरिका! चाबहार और ग्वादर बंदरगाहों के पास नए सैन्य ठिकाने बनाने की कोशिश में वॉशिंगटन

North-South Corridor: तेहरान से बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आई है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के वरिष्ठ सलाहकार अली अकबर वेलायती ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वॉशिंगटन चाबहार बंदरगाह (ईरान) और ग्वादर बंदरगाह (पाकिस्तान) के आसपास नए सैन्य अड्डे स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है.

America preparing surround Iran Washington trying to build new military bases near Chabahar and Gwadar ports
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North-South Corridor: तेहरान से बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आई है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के वरिष्ठ सलाहकार अली अकबर वेलायती ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वॉशिंगटन चाबहार बंदरगाह (ईरान) और ग्वादर बंदरगाह (पाकिस्तान) के आसपास नए सैन्य अड्डे स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है.

उनका कहना है कि अमेरिका का मकसद इस कदम के जरिए क्षेत्रीय व्यापार, ऊर्जा मार्गों और चीन के प्रभाव पर नियंत्रण करना है. वेलायती ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका इस क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति बढ़ाता है, तो यह पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन सकता है.

“अमेरिका क्षेत्रीय नियंत्रण की साजिश रच रहा है”

ईरान के सरकारी मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में अली अकबर वेलायती ने कहा, “अमेरिका एक बार फिर पश्चिम एशिया में अपने सैन्य और राजनीतिक प्रभाव को पुनर्स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. उसका लक्ष्य है कि वह चाबहार और ग्वादर बंदरगाहों के आसपास सैन्य ठिकाने स्थापित करके चीन और रूस जैसे देशों की गतिविधियों की निगरानी करे.”

उन्होंने दावा किया कि हाल के महीनों में अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान दोनों पर दबाव बढ़ाया है, ताकि वह अपनी रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर सके. उन्होंने कहा, “पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी बार-बार अमेरिका जा रहे हैं, और ये दौरे केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए नहीं हैं. वॉशिंगटन यहां अपने रक्षा ढांचे के विस्तार पर विचार कर रहा है.”

चाबहार बंदरगाह: भारत और ईरान की साझेदारी का प्रतीक

चाबहार बंदरगाह, ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है. यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में अरब सागर के किनारे बसा है. 2018 में इस पोर्ट को अमेरिकी प्रतिबंधों से विशेष छूट मिली थी, ताकि भारत अफगानिस्तान तक अपने व्यापारिक रास्ते को जारी रख सके.

भारत ने इस बंदरगाह के शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन की जिम्मेदारी ली है और अब तक 120 मिलियन डॉलर (करीब 1,000 करोड़ रुपये) का निवेश कर चुका है. भारत का लक्ष्य है कि 2026 तक इस पोर्ट की क्षमता पांच गुना बढ़ा दी जाए.

यह बंदरगाह भारत के लिए सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसके जरिए भारत पाकिस्तान को बायपास करके सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच सकता है, यही वजह है कि चाबहार को अक्सर चीन संचालित ग्वादर पोर्ट का प्रतिद्वंद्वी कहा जाता है.

भारत के लिए चाबहार क्यों अहम है?

भारत लंबे समय से इस बंदरगाह को अपने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नेटवर्क का केंद्र बनाना चाहता है. यह भारत को ईरान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस से जोड़ने का अवसर देता है. चाबहार के जरिए भारत पाकिस्तान के नियंत्रण वाले रास्तों पर निर्भरता खत्म कर सकता है.

यह बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा बनने जा रहा है, जो रूस और यूरोप को मिडिल ईस्ट से जोड़ने वाला एक विशाल व्यापार मार्ग है. भारत ने चाबहार परियोजना के लिए 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया है और 2024 में ईरान के साथ 10 साल का मैनेजमेंट एग्रीमेंट साइन किया है.

ग्वादर बनाम चाबहार: एशिया की दो रणनीतिक धुरी

जहां ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है और चीन की मदद से विकसित हुआ है, वहीं चाबहार पोर्ट भारत और ईरान की साझेदारी से खड़ा हुआ है. ग्वादर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके मुकाबले चाबहार भारत की काउंटर स्ट्रेटेजी के रूप में देखा जाता है. 

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ग्वादर या चाबहार के पास सैन्य अड्डे बनाने की कोशिश करता है, तो यह न केवल भारत-ईरान संबंधों पर असर डालेगा, बल्कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) पर भी प्रत्यक्ष दबाव पैदा करेगा.

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