अमेरिका की वायुसेना अपनी सैन्य ताकत को और अधिक धार देने की तैयारी में है. इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए उसने बोइंग (Boeing) और एप्लाइड रिसर्च एसोसिएट्स (Applied Research Associates - ARA) को एक नया कॉन्ट्रैक्ट सौंपा है, जिसके तहत अगली पीढ़ी का बंकर-बस्टर बम तैयार किया जाएगा. यह बम मौजूदा Massive Ordnance Penetrator (MOP) की तुलना में आकार में छोटा, वजन में हल्का और मारक क्षमता में कहीं अधिक घातक होगा. इस नए हथियार को नेक्स्ट जेनरेशन पेनिट्रेटर (NGP) नाम दिया गया है.
इस परियोजना के तहत बोइंग को बम के टेल किट और उसके विमान में इंटीग्रेशन का काम सौंपा गया है, जबकि ARA इसकी डिज़ाइन और लैब स्तर पर टेस्टिंग की जिम्मेदारी निभाएगी. अगले दो वर्षों में इसका एक प्रोटोटाइप तैयार किया जाना है. यह पूरा मिशन अमेरिकी वायुसेना के 'विंग-टू-विंग इन्वेस्टमेंट' कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों का विकास करना है. इस बम को विशेष रूप से B-21 रेडर स्टील्थ बॉम्बर्स में शामिल करने के लिए डिजाइन किया जा रहा है.
क्यों उठाया गया NGP विकसित करने का कदम?
अमेरिका की वायुसेना ने यह निर्णय जून में हुए एक विशेष सैन्य ऑपरेशन के बाद लिया, जिसे मिडनाइट हैमर नाम दिया गया था. इस अभियान के तहत अमेरिका ने पहली बार MOP बमों का युद्ध में इस्तेमाल किया. छह B-2 बॉम्बर्स ने ईरान के फोर्डो न्यूक्लियर प्लांट पर कुल 12 MOP बम गिराए, जबकि एक अन्य बॉम्बर ने नातांज की अंडरग्राउंड न्यूक्लियर साइट को निशाना बनाया. हालांकि इस हमले से यह स्पष्ट हो गया कि MOP की क्षमता सीमित है और यह पूरी तरह से गहरे भूमिगत ठिकानों को नष्ट करने में सफल नहीं है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के फोर्डो जैसे अत्यधिक गहराई पर स्थित न्यूक्लियर फैसिलिटी को निष्क्रिय करने के लिए एक ही स्थान पर लगातार छह बम गिराने पड़े. मौजूदा MOP बम की लंबाई करीब 6.2 मीटर और वजन 13.5 टन से अधिक है. यह 60 मीटर गहराई तक मजबूत कंक्रीट या चट्टान को भेद सकता है, लेकिन इसे केवल B-2 बॉम्बर ही ले जा सकता है, और मिशन के दौरान विमान को दुश्मन की सीमा के बहुत करीब जाना पड़ता है, जिससे जोखिम काफी बढ़ जाता है.
नई पीढ़ी के बम की विशेषताएं क्या होंगी?
नेक्स्ट जेनरेशन पेनिट्रेटर (NGP) को लेकर जो प्रारंभिक मानक निर्धारित किए गए हैं, उनके मुताबिक इसका वजन करीब 10 टन होगा, यानी यह MOP से 3.5 टन हल्का होगा. इससे न केवल बॉम्बर्स की रेंज बढ़ेगी, बल्कि उन्हें कम जोखिम वाले इलाकों से ऑपरेशन करने में भी मदद मिलेगी. सबसे बड़ी बात ये है कि नया बम GPS के फेल हो जाने की स्थिति में भी अधिकतम 2.2 मीटर के भीतर सटीकता से निशाना लगा सकेगा. इसमें उन्नत गाइडेंस, नेविगेशन और नियंत्रण प्रणाली जोड़ी जाएगी, ताकि यह जटिल और खतरनाक वातावरण में भी उच्च सटीकता बनाए रखे ऐसी क्षमता जो मौजूदा JDAM जैसी प्रणालियों से भी बेहतर मानी जा रही है.
इसके अलावा, वायुसेना इस बात पर भी विचार कर रही है कि इस बम में रॉकेट मोटर जोड़ी जाए ताकि यह अधिक गहराई तक तेजी से प्रवेश कर सके और उसे लंबी दूरी से लॉन्च करना संभव हो सके. इसका अर्थ है कि हमला करने वाले विमान को दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.
कितनी होगी लागत और कब तक होगा तैयार?
यह परियोजना एक बड़े सैन्य निवेश का हिस्सा है, जिसके तहत चार ठेकेदारों को कुल 107 मिलियन डॉलर का बजट आवंटित किया गया है. वायुसेना ने 2025 के लिए 120.8 मिलियन डॉलर और 2026 के लिए 73.7 मिलियन डॉलर खर्च करने की योजना बनाई है. पूरे टेस्ट और विकास कार्यक्रम के 2027 तक चलने की उम्मीद है.
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