अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों से तनाव बना हुआ है. अब यह लड़ाई एक नए दौर में पहुंचती दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 9 अगस्त को कहा कि फिलहाल अमेरिका कोई बड़ा नया सैन्य हमला नहीं करेगा. इसके बजाय ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जाएगा.
मतलब साफ है कि अब मिसाइल और बम की जगह तेल कारोबार, जहाज, बैंकिंग नेटवर्क और प्रतिबंध अमेरिका के बड़े हथियार होंगे. अमेरिका चाहता है कि ईरान की कमाई कम हो, उसके लिए हथियार खरीदना और सेना चलाना मुश्किल हो जाए और आखिर में वह बातचीत के लिए तैयार हो जाए. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रणनीति सच में काम करेगी?
अमेरिका ने रणनीति क्यों बदली?
लंबे समय तक सैन्य दबाव बनाने के बाद भी ईरान पूरी तरह पीछे नहीं हटा. लगातार कार्रवाई में अमेरिका के हथियार और संसाधन भी खर्च हो रहे हैं. ऐसे में आर्थिक दबाव अमेरिका के लिए ऐसा तरीका है, जिससे बिना बड़े नए हमले किए भी ईरान पर दबाव बनाया जा सकता है.
ईरान की तेल कमाई पर सबसे बड़ा वार
ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल पर निर्भर है. इसलिए अमेरिका सबसे पहले उसके तेल कारोबार को निशाना बना रहा है. कोशिश यह है कि ईरानी तेल दुनिया के बाजार तक कम पहुंचे.
लेकिन यहां सबसे बड़ी चुनौती चीन है. चीन ईरान के निर्यात होने वाले तेल का बहुत बड़ा खरीदार माना जाता है. खासकर चीन की छोटी रिफाइनरियां ईरानी तेल खरीदती हैं.
प्रतिबंधों से बचने के रास्ते
ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए कई तरीके अपनाए हैं. वह ऐसे टैंकरों का इस्तेमाल करता है जिनसे तेल की असली पहचान छिपी रहती है. इसे अक्सर “शैडो फ्लीट” कहा जाता है. इसके अलावा वह वैकल्पिक भुगतान और वित्तीय नेटवर्क का भी इस्तेमाल करता है.
युद्ध के दौरान भी ईरान बड़ी मात्रा में तेल निर्यात करता रहा, जिससे उसे अरबों डॉलर की कमाई होती रही.
बैंकिंग और जहाज भी निशाने पर
अमेरिका सिर्फ तेल बिक्री रोकने की कोशिश नहीं कर रहा है. वह ईरान से जुड़े बैंक, विदेशी मुद्रा लेनदेन और समुद्री नेटवर्क पर भी दबाव बढ़ा रहा है.
इसका मकसद है कि ईरान के लिए तेल बेचना, उसे जहाजों से भेजना और उससे मिले पैसे का इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाए.
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है अहम?
इस पूरे मामले में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे महत्वपूर्ण जगह है. दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल इसी रास्ते से गुजरता है. जब भी यहां तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतें ऊपर जाने लगती हैं.
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में रुकावट आने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गईं. इससे दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ गई है.
क्या ईरान झुक जाएगा?
यही ट्रंप की रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है. प्रतिबंधों से ईरान की कमाई कम हो सकती है, लेकिन इसका असर तुरंत नहीं दिखता.
ईरान के पास चीन जैसा बड़ा खरीदार है और प्रतिबंधों से बचने के कई पुराने रास्ते भी हैं. इसलिए जब तक चीन ईरानी तेल खरीदता रहेगा, अमेरिका के लिए ईरान की तेल कमाई पूरी तरह रोकना आसान नहीं होगा.
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. अगर होर्मुज क्षेत्र में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो तेल और समुद्री परिवहन दोनों महंगे हो सकते हैं.
इसका असर भारत के आयात बिल, रुपये की कीमत और महंगाई पर पड़ सकता है. यानी अमेरिका की यह नई रणनीति सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं है. इसका असर चीन, वैश्विक तेल बाजार और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ सकता है.