Vande Mataram: आजादी के जश्न में अब तक क्यों नहीं गूंजा ‘वंदे मातरम’? जानिए विवाद से कानून तक की पूरी कहानी

Independence Day 2026: 79 साल पुरानी परंपरा में बदलाव के साथ लाल किले पर पहली बार ‘वंदे मातरम’ गूंजेगा, जानें इसके पीछे का इतिहास, विवाद और नए कानून की पूरी कहानी.

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Independence Day 2026: भारत का 80वां स्वतंत्रता दिवस इस बार सिर्फ देशभक्ति के उत्सव तक सीमित नहीं रहने वाला है. 15 अगस्त 2026 को दिल्ली के लाल किले पर होने वाला मुख्य समारोह एक ऐसी ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत का गवाह बनेगा, जिसका इंतजार लंबे समय से किया जा रहा था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार 13वीं बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराएंगे और देश को संबोधित करेंगे. लेकिन इस बार समारोह की सबसे बड़ी खासियत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ से जुड़ी है.

रक्षा मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री के संबोधन से पहले लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ का गायन किया जाएगा. स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में राष्ट्रीय गीत की यह प्रस्तुति पहली बार होने जा रही है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आजादी के इतने वर्षों बाद तक लाल किले के मुख्य समारोह में ‘वंदे मातरम’ क्यों नहीं गाया जाता था और अब ऐसा क्या बदला है कि इसे समारोह का हिस्सा बनाया गया है?

लाल किले के समारोह में अब तक क्यों नहीं गूंजा वंदे मातरम?

स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक समारोहों में अब तक राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को ही औपचारिक प्राथमिकता दी जाती रही है. राष्ट्रीय प्रोटोकॉल के तहत ध्वजारोहण और प्रधानमंत्री के संबोधन से जुड़े मुख्य समारोह में राष्ट्रगान की भूमिका प्रमुख रही है. वहीं, ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद इसे लाल किले के मुख्य आधिकारिक कार्यक्रम में नियमित रूप से शामिल नहीं किया गया.

इसके पीछे देश की आजादी से पहले की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है. ‘वंदे मातरम’ को लेकर लंबे समय तक धार्मिक संदर्भों और इसकी स्वीकार्यता को लेकर बहस होती रही. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का मजबूत प्रतीक बन चुका था, लेकिन इसके कुछ हिस्सों को लेकर आपत्तियां भी सामने आई थीं.

वंदे मातरम के शुरुआती दो छंदों पर क्यों बनी सहमति?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती हिस्से में मातृभूमि की स्तुति और भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन मिलता है. हालांकि, गीत के आगे के हिस्सों में देवी दुर्गा और हिंदू धार्मिक प्रतीकों से जुड़े संदर्भ आते हैं. इन्हीं अंशों को लेकर उस दौर में मुस्लिम लीग समेत कुछ राजनीतिक और सामाजिक पक्षों ने आपत्ति जताई थी.

साल 1937 में इस विवाद को देखते हुए कांग्रेस ने सार्वजनिक और राजनीतिक मंचों पर ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों के इस्तेमाल को प्राथमिकता देने का फैसला किया. महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई प्रमुख नेताओं की सलाह के बाद यह व्यवस्था अपनाई गई, ताकि राष्ट्रीय आंदोलन में देश की धार्मिक और सामाजिक विविधता को ध्यान में रखा जा सके.

आजादी के बाद राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत को मिला अलग दर्जा

1947 में देश आजाद हुआ और इसके बाद राष्ट्र की औपचारिक पहचान से जुड़े प्रतीकों को लेकर संविधान सभा में चर्चा हुई. साल 1950 में ‘जन गण मन’ को भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया गया, जबकि ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया.

इस तरह दोनों को देश के राष्ट्रीय जीवन में सम्मानजनक स्थान मिला, लेकिन सरकारी और संवैधानिक प्रोटोकॉल में दोनों की भूमिका अलग रही. स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे औपचारिक राष्ट्रीय समारोहों में राष्ट्रगान का स्थान प्रमुख बना रहा, जबकि राष्ट्रीय गीत का इस्तेमाल अलग-अलग अवसरों पर होता रहा.

अब लाल किले पर क्यों बदली परंपरा?

2026 का स्वतंत्रता दिवस इसी लिहाज से खास होने जा रहा है. इस बार लाल किले के मुख्य समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन से पहले ‘वंदे मातरम’ की प्रस्तुति होगी. इसके बाद राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ भी समारोह का हिस्सा रहेगा.

इस बदलाव को राष्ट्रीय गीत के सम्मान और उसके औपचारिक महत्व से जोड़कर देखा जा रहा है. ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण स्थान रखता है और लंबे समय तक यह देशवासियों के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने वाला प्रमुख गीत रहा है.

नए कानून से क्या बदला?

‘वंदे मातरम’ को लेकर कानूनी स्तर पर भी महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है. संसद ने जुलाई 2026 में Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 पारित किया. इसके जरिए राष्ट्रीय गीत को भी कानूनी सुरक्षा के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है.

यह बदलाव 1971 के Prevention of Insults to National Honour Act में संशोधन के जरिए किया गया है. पहले इस कानून के तहत राष्ट्रगान के अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने जैसी गतिविधियों को दंडनीय माना गया था. संशोधन के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी इस कानूनी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया है.

15 अगस्त को दिखेगा ऐतिहासिक बदलाव

इस बार लाल किले की प्राचीर पर होने वाला स्वतंत्रता दिवस समारोह इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि यहां ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ दोनों की मौजूदगी देखने को मिलेगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तिरंगा फहराने के बाद देश को संबोधित करेंगे और समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे.

राष्ट्रीय गीत की प्रस्तुति स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृतियों को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने का काम करेगी. खास तौर पर युवाओं को केंद्र में रखकर आयोजित किए जा रहे इस वर्ष के समारोह में ‘वंदे मातरम’ का गूंजना देश के स्वतंत्रता संघर्ष, राष्ट्रीय चेतना और बदलते राजकीय प्रोटोकॉल के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है.

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