काठमांडू: नेपाल की अर्थव्यवस्था एक कठिन दौर से गुजर रही है, जहां वित्तीय अस्थिरता गहराती जा रही है. अमेरिका द्वारा आर्थिक सहायता रोकने और राजस्व संग्रह में गिरावट के चलते सरकार को अपने खर्च पूरे करने में दिक्कतें आ रही हैं.
अब हालात ऐसे हैं कि सरकार को देश के नागरिकों से लोन लेना पड़ रहा है और सार्वजनिक कर्ज तेजी से बढ़ रहा है. मौजूदा समय में नेपाल का कर्ज 26.011 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो देश के जीडीपी का 45.77% है.
अमेरिकी मदद बंद होने का असर
अमेरिकी USAID के 95 अरब रुपए के कार्यक्रमों के स्थगन का सीधा असर शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र पर पड़ा है. इसके अलावा, मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन (MCC) परियोजना भी बंद हो गई है, जिससे कई बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट अटक गए हैं.
सरकार के पास 18.063 लाख करोड़ रुपए का बजट है, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते इसमें 10% की कटौती करनी पड़ी है.
बढ़ते कर्ज और आर्थिक अनिश्चितता
सरकार ने वित्त वर्ष 2024 में 5 खरब 47 अरब रुपए का लोन जुटाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन चुकौती के लिए केवल 4 खरब 2 अरब रुपए ही आवंटित किए गए हैं. इससे कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है.
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऋण का सही उपयोग नहीं हो रहा है, जिससे नेपाल की वित्तीय स्थिति और बिगड़ सकती है.
सरकार की रणनीति और आगे की राह
नेपाल सरकार ने आर्थिक सुधार के लिए एक आयोग का गठन किया है, लेकिन अब तक इसका कोई ठोस असर देखने को नहीं मिला है.
इसके अलावा, राजस्व संग्रह में कमी और सुस्त आर्थिक गतिविधियों के चलते सरकार अपने लक्ष्य पूरे करने में विफल रही है. चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में राजस्व लक्ष्य से 1.5 ट्रिलियन रुपए कम रहा, जबकि खर्च 93 अरब रुपए अधिक हो गया.
क्या नेपाल इस संकट से उबर पाएगा?
नेपाल को इस वित्तीय संकट से बाहर आने के लिए आर्थिक नीतियों में बदलाव और बाहरी निवेश आकर्षित करने की आवश्यकता है. साथ ही, वैश्विक साझेदारों के साथ नए सहयोग समझौतों पर काम करना होगा ताकि देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर किया जा सके.
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