Bangladesh Violence: बांग्लादेश के ताजा हालात एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह है देश के कार्यवाहक चीफ एडवाइजर और नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस का एक बयान, जिसने विवाद को और गहरा कर दिया है. यूनुस ने भारत में हो रही रिपोर्टिंग को 'फेक न्यूज़' बताया और आरोप लगाया कि भारत जानबूझकर सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली खबरें फैला रहा है. यह बयान तब आया है जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमले और उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चिंता जताई जा रही है.
एक अमेरिकी पत्रकार को दिए इंटरव्यू में मोहम्मद यूनुस ने कहा कि जो घटनाएं भारत और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में "धार्मिक हिंसा" के रूप में पेश की जा रही हैं, वे असल में सामान्य सामाजिक टकराव हैं. उनके मुताबिक, “हर विवाद को साम्प्रदायिक रंग देना गलत है.” यूनुस ने सरकार की सतर्कता का भी हवाला दिया और कहा कि अफवाहों से बांग्लादेश की छवि खराब करने की साजिश हो रही है.
I asked interim Bangladeshi leader and Nobel Peace Laureate Muhammad Yunus about accusations of anti-Hindu violence in his country since the revolution that forced out the Hasina government.
— Mehdi Hasan (@mehdirhasan) October 2, 2025
Watch his response below, and the full interview here:https://t.co/vQGDaoyk89 pic.twitter.com/MX7UEiZsDo
लेकिन जमीन पर हालात कुछ और कहानी कह रहे हैं...
यूनुस के दावे भले ही राजनीतिक बयानबाजी के दायरे में रखे जा सकते हों, लेकिन ढाका, चट्टग्राम, सिलहट और बरिशाल जैसे इलाकों से सामने आई रिपोर्ट्स किसी और तस्वीर को दिखा रही हैं. पिछले एक साल में मंदिरों पर हमले, मूर्तियों को तोड़ा जाना, धार्मिक नेताओं की गिरफ्तारी और हिंदू समुदाय के पलायन की खबरें बार-बार सामने आई हैं. इन घटनाओं की अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी निंदा की है.
क्या पहचान की मांग 'सांप्रदायिकता' का हल है?
यूनुस का यह कहना कि अल्पसंख्यकों को खुद को केवल हिंदू नहीं, बल्कि “बांग्लादेशी नागरिक” के रूप में पहचानना चाहिए, कई विश्लेषकों को खटक रहा है. सवाल ये है कि क्या एक अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक पहचान को नजरअंदाज करना, उनके अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में कोई समाधान है? विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बयानबाजी से अल्पसंख्यकों के भीतर असुरक्षा और गहरी हो सकती है.
सत्ता में बदलाव, सोच में बदलाव?
2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मोहम्मद यूनुस को देश के आर्थिक और प्रशासनिक संकट को संभालने की जिम्मेदारी मिली थी. लेकिन तब से ही उन पर “भारत-विरोधी झुकाव” अपनाने के आरोप लगते रहे हैं. उनके हालिया बयान को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है, खासकर तब, जब दक्षिण एशिया में धार्मिक असहिष्णुता के मुद्दे पहले से ही तनाव का कारण बने हुए हैं.
जब सड़कों पर उतरा हिंदू समुदाय
नवंबर 2024 में ढाका की सड़कों पर करीब 30,000 हिंदू प्रदर्शनकारियों ने एक शांतिपूर्ण मार्च किया था. उनका मुख्य संदेश था, “सुरक्षा चाहिए, इंसाफ चाहिए.” उन्होंने धार्मिक नेताओं पर दर्ज देशद्रोह के मुकदमे वापस लेने और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देने की मांग की थी. ऐसे में अब यूनुस का यह कहना कि "कुछ नहीं हो रहा", कई लोगों के लिए आंखों में धूल झोंकने जैसा महसूस हो रहा है.
यह भी पढ़ें- Zoho Notes App: अब पेन-पेपर की छुट्टी! Arratai के बाद इस डिजिटल नोट्स ऐप ने जीत लिया सबका दिल