अमेरिका के राष्ट्रपति और 2024 के रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा सिस्टम में बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है. अब इस वीजा के लिए आवेदन करने पर 100,000 डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) की भारी फीस देनी होगी.
व्हाइट हाउस की ओर से शुक्रवार को जारी एक आधिकारिक बयान में इस निर्णय को अमेरिका की नौकरियों, राष्ट्रीय सुरक्षा और टेक इंडस्ट्री की संरचना को बचाने की दिशा में अहम कदम बताया गया है.
क्यों बढ़ाई गई फीस? जानिए व्हाइट हाउस की दलीलें
1. अमेरिकी नौकरियों में गिरावट का कारण बना H-1B?
प्रशासन का कहना है कि H-1B वीजा का लगातार दुरुपयोग हो रहा है. अमेरिकी कंपनियां जानबूझकर विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर रखती हैं और अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीनी जाती हैं.
2. IT इंडस्ट्री में विदेशी वर्कफोर्स पर भारी निर्भरता
2003 में जहां सिर्फ 32% H-1B वीजाधारी IT सेक्टर में काम करते थे, अब यह आंकड़ा 65% से ज्यादा हो चुका है. ट्रंप प्रशासन इसे अमेरिका की तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए खतरा मानता है.
3. STEM छात्रों के लिए घटती अवसर की संभावनाएं
रिपोर्ट्स के अनुसार, कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग जैसे टेक्निकल क्षेत्रों में अमेरिकी स्नातकों की बेरोजगारी दर 6% से अधिक है. प्रशासन का मानना है कि विदेशी कर्मचारियों के कारण देश के युवा टेक फील्ड से दूर हो रहे हैं.
कंपनियों पर भी गंभीर आरोप
व्हाइट हाउस ने कुछ कंपनियों के उदाहरण देकर बताया कि किस तरह से उन्होंने बड़ी संख्या में अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी करते हुए H-1B वीजाधारियों को नौकरी पर रखा. एक कंपनी ने 5,000 वीजा मिलने के बाद 16,000 अमेरिकी कर्मचारियों को निकाला. ओरेगन की एक अन्य फर्म ने 2,400 नौकरियों में कटौती करते हुए करीब 1,700 H-1B वीजा हासिल किए. 2022 के बाद से कुछ बड़ी कंपनियों ने अमेरिकी स्टाफ में 27,000 की कटौती की, लेकिन 25,000 से ज्यादा वीजा आवेदन को मंजूरी दिलवाई.
ट्रेनिंग देकर रिप्लेस किया गया अमेरिकी स्टाफ
रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिकी कर्मचारियों को गोपनीयता समझौते के तहत मजबूर किया गया कि वे अपने H-1B रिप्लेसमेंट को खुद ट्रेन करें.
राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ा
ट्रंप प्रशासन ने यह भी कहा कि H-1B पर अधिक निर्भरता अमेरिका की प्रौद्योगिकीय स्वतंत्रता और साइबर सुरक्षा के लिए खतरा है. ऐसे वर्कर्स अमेरिका की अत्यधिक संवेदनशील संरचनाओं में शामिल होते हैं, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम होता है.
क्या हैं आने वाले बदलाव?
ट्रंप ने इसके साथ ही कई और सुधारों की योजना की घोषणा की श्रम विभाग अब वीजाधारियों के वेतन से संबंधित नियमों की समीक्षा करेगा, ताकि कम सैलरी पर हायरिंग बंद हो सके. गृह सुरक्षा विभाग नए नियम बनाएगा जिससे सिर्फ हाई सैलरी और हाई स्किल वाली नौकरियों के लिए ही H-1B स्वीकृतियां दी जाएंगी.
‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का दोहराव
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनके कार्यकाल में “हर नौकरी सबसे पहले अमेरिकी नागरिकों के लिए सुरक्षित की गई है.” उनका दावा है कि पिछली सरकारों की तुलना में उन्होंने विदेशी श्रमिकों की संख्या घटाई और अवैध आप्रवासियों को फेडरल वर्कफोर्स से बाहर किया.
ये सिर्फ एक फीस नहीं, एक नीतिगत बदलाव है
100,000 डॉलर की यह भारी फीस केवल राजस्व जुटाने का तरीका नहीं है, बल्कि यह ट्रंप प्रशासन की “अमेरिकी नौकरियों को पहले” देने की रणनीति का हिस्सा है. इसका मकसद कंपनियों को यह सोचने पर मजबूर करना है कि उन्हें वाकई H-1B वर्कर की जरूरत है या नहीं.
क्या होगा असर?
भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर सबसे बड़ा असर. H-1B वीजा की मांग में भारी गिरावट हो सकती है. अमेरिकी कंपनियों को महंगे टैलेंट पर निर्भर रहना पड़ेगा. अमेरिका में कार्यरत मौजूदा H-1B होल्डर्स के लिए राहत की बात — ये नियम नए आवेदनों पर लागू होंगे