क्या अब सेना संभालेगी नेपाल की कमान? आर्मी चीफ का आया बयान, फिर पीएम ओली को बचाने क्यों नहीं आए जनरल?

    नेपाल इन दिनों एक बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है. देशभर में युवा सड़कों पर हैं, गुस्से में हैं, और बदलाव की मांग कर रहे हैं.

    Why did Nepal Army Chief General not come to save PM Oli
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    नेपाल इन दिनों एक बेहद नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है. देशभर में युवा सड़कों पर हैं, गुस्से में हैं, और बदलाव की मांग कर रहे हैं. GEN-Z यानी नई पीढ़ी के नेतृत्व में हो रहे इन विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक ढांचे की नींव तक को हिलाकर रख दिया है.

    प्रदर्शनों के दबाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने पद से इस्तीफा दे दिया है. मगर असली सवाल अब यह है कि क्या नेपाल में अब कमान सेना के हाथों में जाएगी? और अगर हां, तो नेपाली सेना अब तक चुप क्यों बैठी थी?

    इन सवालों के बीच सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिगडेल का एक बयान सामने आया है, जिसने देशभर में हलचल और तेज़ कर दी है.

    प्रदर्शन बेकाबू और ओली की विदाई

    सब कुछ अचानक नहीं हुआ. बीते सोमवार को प्रदर्शनकारियों पर की गई पुलिस की बर्बर कार्रवाई में 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. इससे देशभर के युवाओं में उबाल आ गया.

    मंगलवार को हजारों लोग सड़कों पर उतरे और देश की राजधानी काठमांडू की तस्वीर ही बदल गई. प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन, संसद भवन और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए और कई इमारतों में तोड़फोड़ हुई. हालात इतने बिगड़े कि कई मंत्री खुद को इस्तीफा देने पर मजबूर महसूस करने लगे. आखिरकार, प्रधानमंत्री ओली ने भी इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति ने तत्काल मंजूर कर लिया.

    जनरल सिगडेल ने क्या कहा?

    स्थिति को संभालने के लिए देर शाम सेना प्रमुख जनरल सिगडेल ने जनता को संबोधित किया. लगभग तीन मिनट के इस वीडियो संदेश में उन्होंने बेहद संयमित और भावनात्मक अपील की.

    उन्होंने कहा, "हम सबका साझा दायित्व है कि देश की अखंडता और शांति बनाए रखें. मैं सभी से आग्रह करता हूं कि बातचीत का रास्ता अपनाएं और प्रदर्शन को फिलहाल स्थगित करें."

    उन्होंने प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्तियों को हुए नुकसान पर खेद जताया, लेकिन साथ ही साफ संकेत दिए कि सेना सीधे टकराव से बचना चाहती है.

    सेना की चुप्पी: रणनीति या कमजोरी?

    सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि जब हालात इतने बिगड़ चुके थे, तब सेना मैदान में क्यों नहीं उतरी? आखिर सेना को राष्ट्रपति भवन, संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसी अहम संस्थाओं की रक्षा करनी चाहिए थी, तो फिर चुप्पी क्यों?

    इस पर सेना के भीतर से ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने खुलासा किया कि हालात बेहद संवेदनशील थे.

    सेना के सामने दो रास्ते थे-

    • या तो वह सत्ता का साथ देती और जनता से टकरा जाती,
    • या फिर वह तटस्थ रहती और स्थिति को बिना हथियार के सुलझाने का प्रयास करती.

    अगर सेना सड़कों पर उतरती, तो हालात गृहयुद्ध जैसे बन सकते थे, और इसमें नागरिकों की जानें ज्यादा जातीं, साथ ही सेना की छवि को भी गहरा नुकसान होता.

    इसलिए यह तय किया गया कि जब तक पूरी तरह हालात हाथ से नहीं निकल जाते, तब तक सेना निष्क्रिय बनी रहेगी.

    सेना आई, लेकिन आखिरी वक्त में

    जब हिंसा सीधे प्रधानमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के घरों तक पहुंच गई, तब सेना ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए हस्तक्षेप किया. सूत्रों के अनुसार, सेना ने कुछ नेताओं को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया, जिससे और बड़ी जनहानि टल सकी.

    लेकिन विपक्षी दलों नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के नेताओं का कहना है कि सेना को और पहले सक्रिय होना चाहिए था.

    उनका मानना है कि सेना का देर से हरकत में आना कमजोरी की निशानी है और इससे यह संदेश गया कि राज्य की संरचनाएं चरमराने लगी हैं.

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