इस्लामाबाद/क्वेटा: पाकिस्तान के अशांत बलूचिस्तान प्रांत में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं. बलूच उग्रवादी संगठनों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच टकराव तेज होता जा रहा है. हालिया मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कई इलाकों में पुलिस चौकियों, बाजारों और सरकारी ठिकानों पर हमले हुए हैं. कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि बलूच लड़ाकों ने अलग-अलग जिलों में सुरक्षा बलों को पीछे हटने पर मजबूर किया है.
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन हेरोफ-2’ के दौरान कई पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबरें सामने आई हैं. इस पूरे घटनाक्रम पर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का बयान काफी चर्चा में है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि बलूच लड़ाकों के पास मौजूद आधुनिक हथियारों के सामने पाकिस्तानी सेना खुद को कमजोर महसूस कर रही है. उनके मुताबिक, विद्रोहियों के पास ऐसी तकनीक और हथियार हैं जो सेना के पास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं.
विद्रोहियों के पास सेना से बेहतर हथियार- रक्षा मंत्री
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हालिया इंटरव्यू में कहा कि जंग के मैदान से लौटे सैनिकों ने उन्हें जो बताया, वह चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि बलूच लड़ाकों के पास अत्याधुनिक राइफलें हैं, जिनकी कीमत लाखों रुपये बताई जा रही है. उनके अनुसार, कुछ राइफल्स की कीमत 18 से 20 लाख रुपये तक है, जबकि पाकिस्तानी सेना के कई यूनिट्स अभी भी पुराने हथियारों पर निर्भर हैं.
ख्वाजा आसिफ ने यह भी दावा किया कि विद्रोहियों के पास थर्मल साइट्स जैसे उपकरण हैं, जिनकी कीमत साढ़े चार लाख रुपये के आसपास बताई जा रही है. इसके अलावा, उन्होंने नाइट विजन डिवाइसेस का भी जिक्र किया और कहा कि ये उपकरण अमेरिकी मूल के बताए जा रहे हैं. रक्षा मंत्री के बयान से यह संकेत मिला कि पाकिस्तानी सेना को तकनीकी मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
किन हथियारों से बढ़ी पाकिस्तानी सेना की मुश्किलें?
मीडिया रिपोर्टों और रक्षा मंत्री के बयानों के आधार पर यह सामने आया है कि बलूच लड़ाके अब पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं हैं. उनके पास आधुनिक सैन्य उपकरणों का जखीरा बढ़ता जा रहा है. इनमें प्रमुख रूप से निम्नलिखित हथियार और तकनीकें बताई जा रही हैं:
1. थर्मल वेपन साइट्स (Thermal Weapon Sights):
ये उपकरण गर्मी को पहचानने की तकनीक पर आधारित होते हैं. अंधेरे, धुंध, झाड़ियों या दीवारों के पीछे छिपे व्यक्ति की बॉडी हीट को ये डिवाइस पकड़ लेते हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, इनकी कीमत करीब 4 लाख रुपये के आसपास बताई जाती है. इससे विद्रोही रात के समय या कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी सटीक निशाना साध पा रहे हैं.
2. एडवांस नाइट विजन डिवाइसेस (NVDs):
नाइट विजन तकनीक का इस्तेमाल लंबे समय से सेनाएं करती आ रही हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि बलूच लड़ाकों के पास नई पीढ़ी के आधुनिक नाइट विजन उपकरण हैं. इसके मुकाबले पाकिस्तानी सेना के कई हिस्सों में अभी भी पुराने मॉडल के नाइट विजन इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिससे रात के ऑपरेशन में सेना को नुकसान उठाना पड़ रहा है.
3. आधुनिक राइफलें और स्नाइपर हथियार:
रिपोर्टों के अनुसार, विद्रोही अब एम4 कारबाइन और लंबी दूरी तक मार करने वाली स्नाइपर राइफल्स जैसे हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन राइफलों की कीमत लाखों रुपये में बताई जाती है. इनसे एक से दो किलोमीटर की दूरी तक निशाना साधा जा सकता है, जिससे सुरक्षा बलों की चौकियों और गश्ती दलों पर हमले ज्यादा घातक साबित हो रहे हैं.
कहां से आ रहे हैं ये हथियार?
मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद वहां छोड़े गए हथियारों का एक हिस्सा तस्करी के जरिए क्षेत्र में फैल रहा है. इसे कई विश्लेषक “अमेरिकी विरासत” के रूप में भी संदर्भित करते हैं. माना जा रहा है कि अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं से अवैध हथियारों की तस्करी अपेक्षाकृत आसान हो गई है, जिसका फायदा विद्रोही गुट उठा रहे हैं.
सूत्रों के अनुसार, इन सीमावर्ती इलाकों से आधुनिक हथियार और उपकरण कुछ ही घंटों या दिनों में बलूचिस्तान तक पहुंच जाते हैं. इससे विद्रोहियों की मारक क्षमता में लगातार इजाफा हो रहा है.
क्यों चुनौती बन रहा है बलूचिस्तान का भूगोल?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का भौगोलिक रूप से सबसे बड़ा प्रांत माना जाता है, जो देश के लगभग 40 प्रतिशत हिस्से में फैला है. यहां पहाड़ी इलाके, दुर्गम रास्ते और गहरी खाइयां विद्रोहियों को प्राकृतिक शरण देती हैं. स्थानीय लड़ाकों को इस इलाके की भौगोलिक बनावट की बेहतर समझ है, जिससे वे सुरक्षा बलों की तुलना में अधिक तेजी से छिपने और हमला करने में सक्षम हो जाते हैं.
ख्वाजा आसिफ ने खुद स्वीकार किया कि इस तरह के भूगोल में ऑपरेशन चलाना सेना के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है. दुर्गम इलाकों में आधुनिक तकनीक और जमीनी खुफिया जानकारी के बिना प्रभावी कार्रवाई करना मुश्किल साबित हो रहा है.
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