Mars Influence On Earth: हम अक्सर सोचते हैं कि पृथ्वी का मौसम सिर्फ सूरज की रोशनी, समुद्र की धाराओं या प्रदूषण के कारण बदलता है. लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खुलासा किया है, जिसने खगोल विज्ञान के नियमों को हिला दिया है. हमारे पास का लाल ग्रह मंगल न केवल हमारे आकाश में चमकता है, बल्कि पृथ्वी के क्लाइमेट को लगातार आकार देता है.
नई रिसर्च बताती है कि मंगल अपनी ग्रेविटी के जरिए पृथ्वी की कक्षा और झुकाव को प्रभावित करता है. इसे वैज्ञानिक ‘मिलानकोविच साइकिल’ कहते हैं. अगर मंगल न होता, तो हो सकता है कि हमारी दुनिया का मौसम बिल्कुल अलग होता.
स्टीफन केन और उनकी टीम की इस रिसर्च ने खगोल विज्ञान के समुदाय में हलचल मचा दी है. इस अध्ययन से पता चला कि पृथ्वी का क्लाइमेट किसी अकेले ग्रह की कहानी नहीं है, बल्कि एक पूरे सौरमंडल की सामूहिक रचना है.
मिलानकोविच साइकिल और मंगल का खेल
पृथ्वी लाखों सालों से कभी गर्म, कभी ठंडी होती रही है. वैज्ञानिक इसे मिलानकोविच साइकिल के जरिए समझते हैं. यह साइकिल पृथ्वी के ऑर्बिट और उसकी धुरी के झुकाव पर आधारित है. पहले वैज्ञानिक मानते थे कि इसमें सबसे अहम भूमिका जुपिटर और वीनस जैसे बड़े ग्रह निभाते हैं. लेकिन स्टीफन केन की टीम ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए यह साबित किया कि छोटा सा मंगल ग्रह भी पृथ्वी की साइकिल को गहराई से प्रभावित करता है.
टीम ने अपने सिमुलेशन में मंगल के वजन को जीरो से लेकर दस गुना तक बदलकर देखा. नतीजे चौंकाने वाले थे, मंगल का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के ऑर्बिट और झुकाव पर स्थायी प्रभाव डाल रहा था.
हिमयुग की टाइमिंग भी मंगल तय करता है
वैज्ञानिकों ने पाया कि पृथ्वी पर बर्फ और गर्मी के बड़े पैटर्न यानी आइस एज या हिमयुग की समय-सीमा भी मंगल पर निर्भर करती है. जब पृथ्वी का झुकाव और ऑर्बिट बदलता है, तो ग्लेशियर कब बनेंगे और कब पिघलेंगे, यह तय होता है. सिमुलेशन में देखा गया कि अगर मंगल का वजन बढ़ जाता तो यह साइकिल लंबी हो जाती. यानी, लाल ग्रह ही हमारी दुनिया में हिमयुग की टाइमिंग सेट करने वाला ‘छुपा रुस्तम’ है.
ग्रैंड साइकिल: 24 लाख साल का क्लाइमेट पैटर्न
रिसर्च का सबसे रोमांचक हिस्सा है ग्रैंड साइकिल, 24 लाख साल का लंबा क्लाइमेट साइकिल. सिमुलेशन में जब मंगल का वजन जीरो किया गया, तो यह पैटर्न पूरी तरह गायब हो गया. इसका मतलब है कि मंगल की गैरमौजूदगी में पृथ्वी का लॉन्ग टर्म क्लाइमेट अस्तित्व में नहीं रहता.
मंगल और पृथ्वी के बीच गुरुत्वाकर्षण का रेसोनेंस पृथ्वी की लंबी अवधि की जलवायु को स्थिर रखता है. इसका असर इतना बड़ा है कि अगर मंगल न होता, तो हमारी दुनिया का मौसम बहुत अलग और शायद खतरे में होता.
पृथ्वी की ऑब्लिक्विटी और मौसम का तालमेल
पृथ्वी अपनी धुरी पर एक खास डिग्री पर झुकी हुई है, इसे वैज्ञानिक ऑब्लिक्विटी कहते हैं. इसी झुकाव के कारण हमारे यहां सर्दी और गर्मी आते हैं. रिसर्च में पाया गया कि हर 41 हजार साल में ऑब्लिक्विटी की साइकिल बदलती है और इसका मुख्य नियंत्रक मंगल है.
अगर मंगल का वजन दस गुना अधिक होता, तो साइकिल 55 हजार साल की हो जाती. इसका मतलब है कि लाल ग्रह की ग्रेविटी सीधे तौर पर पृथ्वी की बर्फ की चादरों और ग्लेशियर की गति को नियंत्रित करती है.
रिसर्च का खगोल विज्ञान में बड़ा महत्व
यह रिसर्च सिर्फ पृथ्वी तक सीमित नहीं है. इसका असर एक्सोप्लेनेट्स यानी अन्य सौरमंडलों में जीवन की खोज पर भी पड़ सकता है. पहले वैज्ञानिक मानते थे कि किसी ग्रह पर जीवन के लिए सिर्फ उसका सूरज से दूरी मायने रखती है. लेकिन अब समझना होगा कि उस ग्रह के पड़ोसी ग्रह कौन हैं और उनकी ग्रेविटी क्या कर सकती है.
सही पड़ोसी ग्रह किसी दुनिया को जमने से बचा सकता है और जीवन के लिए स्थिर मौसम सुनिश्चित कर सकता है. यही कारण है कि मंगल जैसी छोटी वस्तु भी ब्रह्मांड में जीवन के लिए निर्णायक साबित हो सकती है.
हमारा क्लाइमेट पूरे सौरमंडल का खेल
स्टीफन केन की रिसर्च ने यह साफ कर दिया है कि पृथ्वी का मौसम अकेले काम नहीं करता. यह सौरमंडल के सभी ग्रहों के सामूहिक प्रभाव से बनता है. जुपिटर और वीनस बड़े खिलाड़ी हैं, लेकिन मंगल चुपचाप हमारी दुनिया के मौसम, हिमयुग और जीवन के अस्तित्व को प्रभावित कर रहा है.
यह शोध ArXiv पर प्रकाशित हुई है और इससे यह स्पष्ट हुआ कि ब्रह्मांड में सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है. एक छोटे ग्रह की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी हमारी दुनिया को हमेशा के लिए बदल सकती है.
यह भी पढे़ं- 'धुरंधर' को प्रोपेगेंडा बताने वालों को आर माधवन का तगड़ा जवाब, बॉक्स ऑफिस कलेक्शन देखने की दी सलाह