भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में आज का दिन बेहद खास माना जा रहा है. अब तक अंतरिक्ष मिशनों की पहचान मुख्य रूप से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से जुड़ी रही है, लेकिन अब निजी क्षेत्र भी उसी आत्मविश्वास के साथ अंतरिक्ष की दहलीज पर दस्तक दे रहा है. श्रीहरिकोटा से आज सुबह 11:30 बजे भारत के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की लॉन्चिंग सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के स्पेस सेक्टर में आत्मनिर्भरता और निजी भागीदारी की नई शुरुआत का प्रतीक है. इस ऐतिहासिक मिशन के पीछे जिस शख्स का सपना और संघर्ष है, उनका नाम है पवन कुमार चंदना. कभी मैथ्स में सिर्फ 51 अंक पाने वाले इस इंजीनियर ने ISRO की सुरक्षित नौकरी छोड़कर ऐसा रास्ता चुना, जिसने आज उन्हें भारत के सबसे चर्चित स्पेस उद्यमियों में शामिल कर दिया है.
विक्रम-1 लॉन्च से भारत के निजी स्पेस सेक्टर को मिलेगी नई पहचान
श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने वाला विक्रम-1 भारत का पहला निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है. यह मिशन भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक बड़े मील का पत्थर माना जा रहा है. लॉन्च के बाद यह रॉकेट करीब 16 मिनट तक अपनी निर्धारित उड़ान पूरी करेगा. इसकी ऊंचाई लगभग 22 मीटर और व्यास 1.7 मीटर है.
विक्रम-1 को विशेष रूप से छोटे सैटेलाइट्स को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है. यह भारत के उन शुरुआती रॉकेटों में शामिल है जो निजी क्षेत्र की तकनीक और इंजीनियरिंग क्षमता का प्रदर्शन करेंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि यह मिशन आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक कमर्शियल लॉन्च मार्केट में मजबूत स्थिति दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
साधारण छात्र से स्पेस टेक्नोलॉजी का बड़ा नाम बनने तक का सफर
पवन कुमार चंदना का जन्म वर्ष 1991 में हैदराबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. स्कूली जीवन में वह किसी टॉपर छात्र की तरह नहीं जाने जाते थे. उन्होंने स्वयं एक इंटरव्यू में बताया था कि स्कूल में गणित विषय में उनके केवल 51 अंक आए थे.
हालांकि, कम अंक कभी उनकी क्षमता की पहचान नहीं बने. मशीनों, इंजीनियरिंग और नई तकनीकों के प्रति उनकी जिज्ञासा लगातार बढ़ती गई. यही रुचि उन्हें आगे चलकर देश के सबसे प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक IIT खड़गपुर तक ले गई.
IIT खड़गपुर से मिली मजबूत तकनीकी नींव
साल 2007 में पवन कुमार चंदना ने IIT की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की और IIT खड़गपुर में दाखिला लिया. यहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया और इसके बाद थर्मल इंजीनियरिंग में एमटेक की डिग्री भी हासिल की. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्होंने रॉकेट प्रोपल्शन, एडवांस्ड मैटेरियल्स और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे विषयों पर गहराई से काम किया. यही अनुभव आगे उनके करियर की सबसे बड़ी ताकत बना.
ISRO के अहम मिशनों का हिस्सा बने
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 2012 में पवन कुमार चंदना भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) से जुड़े. यहां उन्होंने भारत के कई महत्वपूर्ण रॉकेट कार्यक्रमों में योगदान दिया.
वह GSLV Mk-III जैसे भारी रॉकेट प्रोजेक्ट से जुड़े रहे, जिसका उपयोग बाद में चंद्रयान मिशनों में भी किया गया. इसके अलावा उन्होंने S200 सॉलिड बूस्टर के सिस्टम इंजीनियर के रूप में काम किया और स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SSLV) मिशन में डिप्टी प्रोजेक्ट मैनेजर की जिम्मेदारी भी संभाली. उनकी उत्कृष्ट तकनीकी क्षमता को देखते हुए वर्ष 2016 में ISRO ने उन्हें दो इनोवेशन अवॉर्ड्स से सम्मानित किया.
जब सरकारी नौकरी छोड़कर चुना जोखिम भरा रास्ता
ISRO में काम करने के दौरान पवन कुमार चंदना और उनके सहयोगी नागा भरत डाका ने एक बड़ी संभावना को पहचाना. उन्होंने महसूस किया कि पूरी दुनिया में छोटे सैटेलाइट्स की मांग तेजी से बढ़ रही है और भविष्य में कम लागत वाले, तेज और ऑन-डिमांड लॉन्च की आवश्यकता होगी. इसी सोच ने दोनों दोस्तों को एक बड़ा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और जून 2018 में हैदराबाद में स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की. उस समय यह फैसला बेहद जोखिम भरा माना गया, लेकिन दोनों का विश्वास था कि भारत भी निजी स्पेस लॉन्च सेवाओं में वैश्विक पहचान बना सकता है.
स्काईरूट का सपना, अंतरिक्ष तक पहुंच को आसान बनाना
स्काईरूट एयरोस्पेस का लक्ष्य केवल रॉकेट बनाना नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष तक पहुंच को आसान और सुलभ बनाना है. कंपनी का विजन है कि भविष्य में किसी भी ग्राहक के लिए सैटेलाइट लॉन्च करना उतना ही सरल हो जाए, जितना आज मोबाइल ऐप के जरिए टैक्सी बुक करना. इसी सोच के साथ कंपनी ने आधुनिक तकनीकों पर निवेश किया और कम लागत में अधिक कुशल रॉकेट विकसित करने की दिशा में काम शुरू किया.
विक्रम-S ने खोला सफलता का रास्ता
18 नवंबर 2022 को स्काईरूट ने भारत का पहला निजी सब-ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-S सफलतापूर्वक लॉन्च किया. इस उपलब्धि के साथ स्काईरूट भारत की पहली निजी कंपनी बन गई जिसने अंतरिक्ष में अपना रॉकेट भेजा. यह सफलता केवल एक परीक्षण नहीं थी बल्कि इसने यह साबित कर दिया कि भारतीय निजी कंपनियां भी विश्वस्तरीय स्पेस टेक्नोलॉजी विकसित करने की क्षमता रखती हैं. विक्रम-S की सफलता के बाद विक्रम-1 के विकास का रास्ता और मजबूत हो गया.
अत्याधुनिक तकनीक से तैयार किया गया विक्रम-1
विक्रम-1 को पूरी तरह भारत में विकसित किया गया है. इसकी बॉडी कार्बन कंपोजिट मैटेरियल से तैयार की गई है, जिससे इसका वजन कम और मजबूती अधिक बनी रहती है. इसके इंजनों के निर्माण में 3D प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो आधुनिक एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. कम लागत, तेज निर्माण और उच्च दक्षता के कारण यह रॉकेट भविष्य के कमर्शियल स्पेस लॉन्च बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है.
दुनिया के बड़े निवेशकों ने भी जताया भरोसा
स्काईरूट एयरोस्पेस की तकनीक और विजन ने दुनिया की प्रमुख निवेश कंपनियों का भी ध्यान आकर्षित किया. ब्लैकरॉक, टेमासेक और GIC जैसे वैश्विक निवेशकों ने कंपनी में निवेश किया. इन निवेशों के बाद स्काईरूट भारत की पहली स्पेस टेक यूनिकॉर्न कंपनी बन गई, जिसकी वैल्यू एक अरब डॉलर से अधिक आंकी गई. यह उपलब्धि भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए भी एक बड़ी सफलता मानी जाती है.
फोर्ब्स से लेकर राष्ट्रीय सम्मान तक मिला वैश्विक पहचान
पवन कुमार चंदना की उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया. उन्हें वर्ष 2020 में Forbes 30 Under 30 Asia सूची में स्थान मिला. वहीं उनकी कंपनी को भारत सरकार ने नेशनल स्टार्टअप अवॉर्ड से सम्मानित किया. इसके अलावा वर्ष 2018 में उन्हें एयरोस्पेस इंजीनियरिंग डिवीजन पुरस्कार भी मिला. निजी जीवन में उन्होंने अक्टूबर 2019 में निरुपमा तुंगला से विवाह किया.
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