यूपी में इन कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले, डबल से भी ज्यादा मिलेगी सैलरी, खाते में आएंगे 10 लाख रुपये

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश के संविदा शिक्षकों का मासिक वेतन 7 हजार रुपये से बढ़ाकर 17 हजार रुपये करने का निर्देश दिया है. अदालत ने माना कि इतने लंबे समय तक बेहद कम वेतन पर काम कराना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि मानवीय गरिमा के भी खिलाफ है.

Uttar Pradesh contract teachers Salary increased Supreme Court decision
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश के हजारों संविदा शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला किसी राहत से कम नहीं है. सालों से कम वेतन में पढ़ाने को मजबूर ये शिक्षक अब आर्थिक सम्मान की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाते नजर आ रहे हैं. शीर्ष अदालत के आदेश ने न सिर्फ मौजूदा सैलरी बढ़ाने का रास्ता साफ किया है, बल्कि बीते नौ साल की बकाया रकम दिलाने की भी मजबूत नींव रख दी है. 

7 हजार से 17 हजार तक पहुंची सैलरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश के संविदा शिक्षकों का मासिक वेतन 7 हजार रुपये से बढ़ाकर 17 हजार रुपये करने का निर्देश दिया है. अदालत ने माना कि इतने लंबे समय तक बेहद कम वेतन पर काम कराना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि मानवीय गरिमा के भी खिलाफ है. इस फैसले के बाद संविदा शिक्षकों की मासिक आय में सीधे 10 हजार रुपये का इजाफा होगा, जो उनके लिए बड़ी राहत साबित होगा.

नौ साल का बकाया

इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने केवल भविष्य की सैलरी ही नहीं बढ़ाई, बल्कि वर्ष 2017 से अब तक के वेतन अंतर का भुगतान भी अनिवार्य कर दिया है. यदि कोई शिक्षक 2017 से लगातार संविदा पर कार्यरत है, तो उसे लगभग 100 महीनों का वेतन अंतर एक साथ मिलेगा. इस गणना के अनुसार, हर शिक्षक को करीब 10 लाख रुपये तक की अतिरिक्त राशि मिल सकती है, जो उनकी आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखती है.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को साफ निर्देश दिया है कि बकाया सैलरी का भुगतान छह महीने के भीतर पूरा किया जाए. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 1 अप्रैल 2026 से संविदा शिक्षकों को 17 हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से भुगतान शुरू किया जाए. 

7 हजार रुपये को बताया बंधुआ मजदूरी जैसा

जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने अपने फैसले में बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया. अदालत ने कहा कि एक दशक से अधिक समय तक मात्र 7 हजार रुपये में काम कराना बेगार या बंधुआ मजदूरी जैसा है. कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन बताते हुए पूरी तरह असंवैधानिक करार दिया. पीठ ने यह भी कहा कि 11 महीने के अनुबंध के नाम पर साल दर साल काम लेना और वेतन में कोई सुधार न करना गलत प्रथा है.

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