Houthi Red Sea Attack: यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ अपने हमले तेज कर दिए हैं. ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने लाल सागर के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोचा पर कब्जा कर लिया है. यह इलाका बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के काफी करीब है, जो यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार का अहम रास्ता है. हूतियों की इस बढ़त से सऊदी अरब की चिंता बढ़ गई है. सऊदी अरब को पाकिस्तान से मदद की उम्मीद थी, लेकिन उसने फिलहाल सैन्य कार्रवाई से दूरी बना ली है. ऐसे में अब अमेरिका सऊदी की मदद के लिए आगे आया है.
हूतियों ने सऊदी के सामने बढ़ाई मुश्किल
हूती विद्रोही यमन के पश्चिमी तट पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं. मोचा पर कब्जे को उनकी बड़ी कामयाबी माना जा रहा है. यह बंदरगाह लाल सागर के किनारे और बाब-अल-मंदेब के पास स्थित है. अगर हूतियों का इस इलाके पर नियंत्रण मजबूत होता है तो वे लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों को धमकाने या उनकी आवाजाही रोकने की स्थिति में आ सकते हैं. इससे सऊदी अरब के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी खतरा हो सकता है.
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और यूरोप-एशिया के बीच समुद्री आवाजाही के लिए बेहद अहम रास्ता है.
2022 के बाद फिर तेज हुई जंग
हूतियों और सऊदी अरब समर्थित यमनी सरकार के बीच 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बाद युद्धविराम हुआ था. इसके बाद लड़ाई कुछ कम हुई, लेकिन यमन का बंटवारा बना रहा. अब हूतियों की नई बढ़त से एक बार फिर हालात बिगड़ने का खतरा बढ़ गया है.
हाल के दिनों में सऊदी अरब और हूतियों के बीच संघर्ष तेज हुआ है. इससे पहले अगस्त में भी हूतियों ने मोचा पर ड्रोन और मिसाइलों से हमला किया था. यमनी सेना के मुताबिक इस हमले में 7 लोगों की मौत हुई थी और 30 लोग घायल हुए थे. अब उसी रणनीतिक शहर पर हूतियों के कब्जे ने चिंता और बढ़ा दी है.
पाकिस्तान ने खींचे कदम पीछे
हूतियों के हमलों के बाद सऊदी अरब को पाकिस्तान से भी मदद की उम्मीद थी. पिछले महीने पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच संयुक्त रक्षा समझौता हुआ था. इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने पर उसे सभी पर हमला माना जाएगा. ऐसे में हूतियों के सऊदी शहरों और ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाने के बाद सवाल उठा कि क्या पाकिस्तान समझौते के तहत सऊदी की सैन्य मदद करेगा. लेकिन पाकिस्तान ने फिलहाल ऐसा करने से इनकार कर दिया है.
पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सज्जाद हैदर खान ने कहा कि अभी किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हो रही है. हालांकि उन्होंने कहा कि समय आने पर पाकिस्तान समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारी निभाएगा. इस बीच अमेरिका सऊदी अरब की मदद के लिए आगे आया है.
अमेरिका ने संभाला मोर्चा
पाकिस्तान की तत्काल सैन्य मदद से पीछे हटने के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब का साथ देना शुरू कर दिया है. CNN की रिपोर्ट के मुताबिक 100 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में मौजूद हैं. कुछ अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार यह संख्या करीब 200 सैनिकों तक हो सकती है.
इन अमेरिकी सैन्यकर्मियों का काम सीधे हूतियों पर हमला करना नहीं है. अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी और लक्ष्य तय करने में मदद दे रहा है. इसके अलावा तकनीकी सहायता भी दी जा रही है, जिससे सऊदी सैन्य अधिकारी युद्ध क्षेत्र की स्थिति रियल टाइम में देख सकें. फिलहाल अमेरिकी मदद सीमित है. अमेरिकी सैनिक सीधे हवाई हमलों में शामिल नहीं हैं और न ही वे सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने या अन्य प्रत्यक्ष सैन्य अभियानों में मदद कर रहे हैं.
अमेरिका क्यों है सतर्क?
अमेरिका के लिए हूतियों का बढ़ता प्रभाव केवल सऊदी अरब तक सीमित मामला नहीं है. उसकी सबसे बड़ी चिंता बाब-अल-मंदेब को लेकर है. होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से जिस तरह दुनिया भर में असर पड़ा है, अमेरिका नहीं चाहता कि बाब-अल-मंदेब की स्थिति भी वैसी ही हो.
अगर यह समुद्री रास्ता लंबे समय तक बाधित होता है तो लाल सागर के रास्ते होने वाले वैश्विक व्यापार पर असर पड़ सकता है. अमेरिका को यह भी आशंका है कि ईरान हूतियों की मदद बढ़ाकर इस रास्ते को बंद कराने की कोशिश कर सकता है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यमन में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड के सैकड़ों अधिकारी हूतियों के साथ काम कर रहे हैं.
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