US-Iran Conflict: अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चला आ रहा तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. ईरान के लारक द्वीप पर अमेरिकी सेना की कार्रवाई के बाद तेहरान ने भी जवाबी हमला किया है. अमेरिका का दावा है कि उसने उन लॉन्चरों को निशाना बनाया, जिनके जरिए ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री माइंस बिछाने की तैयारी कर रही थी. इसके कुछ ही समय बाद ईरान ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने का दावा किया.
लारक द्वीप पर अमेरिका ने क्यों किया हमला?
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी सेना ने रविवार, 30 अगस्त 2026 को ईरान के लारक द्वीप पर दो लॉन्चरों को निशाना बनाया. अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी CENTCOM ने बताया कि कार्रवाई IRGC की उस यूनिट के खिलाफ की गई, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री माइंस पहुंचाने की तैयारी कर रही थी. अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार इन लॉन्चरों से ऐसे रॉकेट दागे जाने की तैयारी थी, जिनका इस्तेमाल समुद्री माइंस बिछाने के लिए किया जा सकता था. अमेरिका का कहना है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में माइंस बिछाई जाती हैं तो वहां से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों और आम नाविकों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. अमेरिकी पक्ष ने कार्रवाई को समुद्री यातायात की सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित रखना था. जुलाई के बाद ईरान के खिलाफ यह पहला सार्वजनिक रूप से सामने आया अमेरिकी सैन्य हमला बताया जा रहा है.
अमेरिकी हमले में दो लोगों की मौत का दावा
ईरान से जुड़े मीडिया संस्थानों ने दावा किया कि लारक द्वीप पर अमेरिकी ड्रोन हमले में दो लोगों की मौत हुई है, जबकि दो अन्य घायल हुए हैं. हालांकि, हमले से जुड़े सभी विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि तत्काल नहीं हो सकी है. लारक द्वीप पर अमेरिकी कार्रवाई के बाद घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ा और ईरान की ओर से भी जवाबी सैन्य कार्रवाई की खबर सामने आई. ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने जॉर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला करने का दावा किया.
ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों को बनाया निशाना
ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के मुताबिक किंग हुसैन और अल-अज्राक एयरबेस को निशाना बनाया गया. ईरान का दावा है कि इन हमलों में अमेरिकी सैन्य और तकनीकी ढांचे को टारगेट किया गया. हालांकि, जॉर्डन की सेना ने बताया कि उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने आठ मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया. शुरुआती रिपोर्टों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बड़े नुकसान या किसी बड़े हताहत की पुष्टि नहीं हुई है. ऐसे में ईरानी हमले के वास्तविक प्रभाव को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं है.
क्यों बेहद अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है. फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस व्यापार के लिए बेहद अहम है. इस रास्ते पर सैन्य तनाव बढ़ने का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है. समुद्री माइंस का इस्तेमाल इस पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है. एक बार माइंस बिछाए जाने के बाद उन्हें हटाने में समय लगता है और तब तक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है. यही वजह है कि अमेरिका स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी ऐसी गतिविधि को लेकर बेहद सतर्क है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग को खतरा हो सकता है.
अमेरिका पहले ही कर चुका है माइंस हटाने की कार्रवाई
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका ने पिछले सप्ताह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुख्य शिपिंग रूट से समुद्री माइंस हटाने की कार्रवाई पूरी करने की जानकारी दी थी. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि यदि ईरान ने दोबारा समुद्री मार्ग में माइंस बिछाने की कोशिश की तो इसके लिए जिम्मेदार जहाजों या नावों के खिलाफ कड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी. अब लारक द्वीप पर अमेरिकी हमला सामने आने के बाद ट्रंप की पिछली चेतावनी और मौजूदा घटनाक्रम को जोड़कर देखा जा रहा है. इससे संकेत मिलता है कि वॉशिंगटन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में समुद्री आवाजाही को लेकर ईरान की किसी भी संभावित कार्रवाई को रोकने के लिए सैन्य विकल्प इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हट रहा.
छह महीने का तनाव फिर पहुंचा खतरनाक मोड़ पर
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले छह महीनों से जारी तनाव में जुलाई के बाद कुछ समय के लिए सैन्य गतिविधियों में कमी देखी गई थी. इसी वजह से माना जा रहा था कि दोनों पक्ष फिलहाल सीधे टकराव से बचने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन लारक द्वीप पर अमेरिकी हमला और उसके बाद जॉर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी मिसाइल हमले के दावे ने इस तस्वीर को बदल दिया है. अगर दोनों देशों के बीच जवाबी सैन्य कार्रवाई का सिलसिला आगे बढ़ता है तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है.
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