वाशिंगटन/यरुशलम: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल की संसद (नेसेट) को संबोधित करते हुए एक बड़ा बयान दिया, जिसमें उन्होंने गाजा में चल रहे हालात, हमास के भविष्य, ईरान की भूमिका और अमेरिका के रणनीतिक हस्तक्षेप पर खुलकर चर्चा की.
अपने भाषण में ट्रंप ने खुलासा किया कि गाजा में बंधकों की रिहाई के पीछे अमेरिका द्वारा किए गए तीन विशेष सैन्य हमलों का बड़ा योगदान रहा, जिनका निशाना ईरान की परमाणु सुविधाएं थीं. ट्रंप के अनुसार, इन हमलों के बिना यह समझौता और बंधकों की सुरक्षित रिहाई संभव नहीं हो पाती.
ईरान पर हमले: 'तीन वार, और कमर टूट गई'
अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज में ट्रंप ने कहा, "हमने इस साल की शुरुआत में ईरान की तीन अहम न्यूक्लियर साइट्स को टारगेट किया. इस ऑपरेशन के बाद पूरे मिडिल ईस्ट और खासकर इजरायल पर मंडरा रहा युद्ध का खतरा लगभग समाप्त हो गया. इन हमलों ने ईरान की रणनीतिक क्षमता को झकझोर दिया और उन्हें बातचीत की मेज पर लाने में मजबूर किया."
ट्रंप के मुताबिक, इस सैन्य कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य सिर्फ ईरान को चेतावनी देना नहीं था, बल्कि गाजा में बंधक बनाए गए नागरिकों की सुरक्षित वापसी के लिए एक कूटनीतिक और सामरिक दबाव बनाना था.
हमास के हथियार डालने का दावा
अपने संबोधन में ट्रंप ने जोर देकर कहा कि अमेरिका की पहल और क्षेत्रीय समर्थन से गाजा में 'डीमिलिट्राइजेशन' (निरस्त्रीकरण) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. उन्होंने कहा, "हमने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि हथियारों की ताकत से हासिल हर जीत इजरायल ने पहले ही हासिल कर ली है. अब वक्त है स्थायी शांति और विकास की दिशा में बढ़ने का. हमास अब हथियार डालने को मजबूर हो चुका है."
हालांकि ट्रंप के इस दावे पर राजनीतिक और कूटनीतिक विशेषज्ञों ने मिश्रित प्रतिक्रियाएं दी हैं, क्योंकि हमास के कई गुट अभी भी अमेरिका या इजरायल की मध्यस्थता को अस्वीकार करते रहे हैं.
मिडिल ईस्ट में 'शांति का युग'
डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) के जरिए जिस अरब-इजरायल मैत्री की नींव उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में रखी थी, वह अब मजबूत होकर पूरे क्षेत्र में फैल रही है.
उन्होंने कहा, "अब्राहम समझौते पर अभी तक चार मुस्लिम देश हस्ताक्षर कर चुके हैं. मेरा विश्वास है कि जल्द ही और भी राष्ट्र इसमें शामिल होंगे. शांति अब सिर्फ सपना नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसे हम रोज़मर्रा के प्रयासों से साकार कर रहे हैं."
ट्रंप के अनुसार, इजरायल अब वैश्विक स्तर पर फिर से ‘प्रिय राष्ट्र’ बन रहा है, और अमेरिका की मदद से वह मध्यपूर्व में स्थायी स्थिरता की ओर बढ़ रहा है.
ईरान, रूस और चीन को सीधा संदेश
ट्रंप ने अपने भाषण में सिर्फ मिडिल ईस्ट ही नहीं, बल्कि ईरान, रूस और चीन जैसे वैश्विक शक्तियों को भी सख्त लहजे में संदेश दिया. उन्होंने कहा, "अब समय आ गया है कि देश युद्ध और हथियारों पर खर्च करने के बजाय अपने नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक पर निवेश करें. अगर हम स्कूल बनाएं, उद्योग लगाएं और AI जैसी आधुनिक तकनीकों में आगे बढ़ें, तो इससे मानवता को फायदा होगा, सिर्फ सत्ता को नहीं."
उन्होंने यहां तक कहा कि अमेरिका अब उन देशों से दोस्ती का हाथ बढ़ाने को तैयार है, जिन्होंने कभी उसके विरोध में खड़े होकर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाई.
ईरान के लिए 'दोस्ती का दरवाजा' खुला
ट्रंप ने अपने भाषण में एक नई पहल की ओर भी इशारा किया, जहां उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ईरान के लिए भी मैत्री और सहयोग के रास्ते खुले हैं, लेकिन शर्त है कि वह अपनी आक्रामक नीतियों को त्यागे.
ट्रंप ने कहा, "ईरान ने वर्षों तक मिडिल ईस्ट को अस्थिर किया है. अब उन्हें समझना होगा कि विनाश का रास्ता केवल नुकसान लाता है. हम उनके लिए भी दोस्ती और सहयोग का हाथ बढ़ा रहे हैं, लेकिन उन्हें बदलना होगा."
यह बयान अमेरिकी विदेश नीति में एक नए दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है, जहां सैन्य दबाव और कूटनीति को एक साथ इस्तेमाल कर के जटिल क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान ढूंढा जा रहा है.
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