BJP Foundation Day: भारतीय राजनीति में आज एक ऐसी पार्टी का दबदबा है, जिसने कई उतार-चढ़ाव झेलते हुए खुद को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया. भारतीय जनता पार्टी का यह सफर आसान नहीं रहा. इसकी जड़ें जनसंघ से शुरू होकर जनता पार्टी के दौर से गुजरते हुए 1980 में एक नए राजनीतिक अध्याय के रूप में सामने आईं.
जनता पार्टी से अलगाव की कहानी
1977 में बनी जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद पार्टी के भीतर मतभेद लगातार बढ़ते गए. सबसे बड़ा विवाद “दोहरी सदस्यता” का था, जिसमें जनसंघ से जुड़े नेताओं के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधों पर सवाल उठाए जा रहे थे.
1980 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने बाबू जगजीवन राम को चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा, लेकिन नतीजे निराशाजनक रहे और पार्टी सिर्फ 32 सीटों पर सिमट गई. हार के बाद भी मतभेद कम नहीं हुए, बल्कि जनसंघ के नेताओं पर ही जिम्मेदारी डाल दी गई.
4 अप्रैल 1980 को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में दोहरी सदस्यता को अमान्य घोषित कर दिया गया. इसके बाद जनसंघ से जुड़े नेताओं के पास अलग रास्ता अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
नई पार्टी का गठन और नई दिशा
5-6 अप्रैल 1980 को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में एक नए राजनीतिक दल की नींव रखी गई. इस सम्मेलन में जनसंघ के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ कई अन्य नेता भी शामिल हुए.
नई पार्टी का नाम रखा गया- भारतीय जनता पार्टी. चुनाव चिन्ह ‘कमल’ तय किया गया. इस नई पार्टी को सिर्फ कैडर आधारित नहीं, बल्कि जनाधार वाली पार्टी बनाने का निर्णय लिया गया.
पार्टी के मंच पर दीनदयाल उपाध्याय के साथ जयप्रकाश नारायण की तस्वीर भी लगाई गई, जो विचारधारा के विस्तार का संकेत था.
अपने अध्यक्षीय भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी ने साफ कहा कि नई पार्टी अतीत से सीख लेकर भविष्य की ओर आगे बढ़ेगी और अपने सिद्धांतों पर कायम रहेगी.
शुरुआती संघर्ष और 1984 की चुनौती
भाजपा के शुरुआती साल आसान नहीं रहे. 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ दो सीटें मिलीं. यह चुनाव उस समय हुआ था जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सहानुभूति की लहर थी, जिससे विपक्ष पूरी तरह कमजोर पड़ गया.
हालांकि, इस हार के बाद भी पार्टी ने अपने संगठन को मजबूत करना जारी रखा और धीरे-धीरे अपनी विचारधारा की ओर लौटने लगी.
राम आंदोलन और राजनीतिक विस्तार
1980 के दशक के अंत में भाजपा ने अपनी राजनीतिक रणनीति को नया मोड़ दिया. राजीव गांधी के कार्यकाल में हुए फैसलों और विवादों के बीच भाजपा ने खुद को एक मजबूत वैचारिक विकल्प के रूप में पेश किया.
राम जन्मभूमि आंदोलन ने पार्टी को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में अहम भूमिका निभाई. इस दौर में लालकृष्ण आडवाणी का नेतृत्व भी तेजी से उभरा.
1989 से 1999: सत्ता की ओर बढ़ते कदम
1989 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी छलांग लगाते हुए 85 सीटें हासिल कीं. इसके बाद पार्टी लगातार आगे बढ़ती गई.
1991 में 120 सीटों के साथ भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई. इसके बाद कई राज्यों में उसकी सरकारें भी बनीं.
1996 में 161 सीटों के साथ अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने, हालांकि यह सरकार 13 दिन ही चल सकी.
1998 और फिर 1999 में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्ण कार्यकाल पूरा किया.
2004 के बाद का दौर और नई रणनीति
2004 के चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई और उसके बाद 2009 में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके थे और आडवाणी का प्रभाव भी कम हो रहा था.
इसी बीच नरेंद्र मोदी, जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत नेता के रूप में उभर रहे थे.
मोदी युग में भाजपा का विस्तार
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. यह 30 से अधिक वर्षों बाद किसी पार्टी को मिला स्पष्ट बहुमत था.
2019 में पार्टी ने 303 सीटों के साथ अपनी स्थिति और मजबूत की. 2024 में संख्या 240 तक आई, लेकिन सहयोगियों के साथ मिलकर सरकार बनाने में भाजपा सफल रही.
आज भाजपा देश के लगभग 20 राज्यों में सत्ता में है या गठबंधन का हिस्सा है. पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पार्टी मुख्य विपक्षी के रूप में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, जबकि दक्षिण भारत में भी विस्तार की कोशिशें जारी हैं.
सबसे बड़ी पार्टी बनने तक का सफर
आज भाजपा सदस्य संख्या के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है. कभी शहरी मानी जाने वाली यह पार्टी अब देश के दूर-दराज के इलाकों तक अपनी पहुंच बना चुकी है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा लगातार चुनावी मोड में रहने वाली पार्टी बन गई है, जहां एक राज्य में चुनाव खत्म होते ही दूसरे राज्य में अभियान शुरू हो जाता है.
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